मानवीय संवेदना ना खोएं

पूरा देश कोरोना महामारी की दूसरी लहर के प्रकोप के सामने त्राहि-त्राहि कर रहा है। केंद्र और राज्य सरकारें  लोगों को दवाई, ऑक्सीजन और अन्य जरूरी सामान उपलब्ध कराने के लिए हर संभव प्रयत्न कर रही हैं। न्यायालय रोज सख्त हिदायत दे रहा है। बावजूद इसके कहीं ना कहीं से किसी ना किसी चीज की कमी की गुहार लगती ही रह रही है। यही नहीं सख्त लॉकडाउन से कारोबार ठप हो रहे हैं। काफी तादाद में लोग बेरोजगार हो रहे  हैं। ऐसे आज देश दो तरह की समस्याओं से जूझ रहा है। एक ओर लोगों का जीवन बचाना है और दूसरे ओर उसकी आजीविका भी सुनिश्चित करना है। लोगों की दवाई भी मिले और रोटी भी मिले सरकारें यह 

सुनिश्चित करने में लगी है। इतने  विशाल जनसंख्या वाले देश के लिए यह करना लोहे के चने चबाने से कम नहीं है। फिर भी किया जा रहा है। ऐसे में आपदा को कालाबाजारी करने वाले और मुनाफाखोरी करने वाले अपने लिए उनकी जेबें भरने का अवसर बना लें। इससे बुरा और निंदनीय कुछ नहीं हो सकता। हमारे दुर्भाग्य से सरकारों के हर खबरदारी और सख्ती की बाद भी यह सब हो रहा है। शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता हो जब रेमसोडिविर इंजेक्शन की कालाबाजारी करते हुए लोग पकड़े ना जाते हो और इसमें में पूरे देश में गजब की एकता  दिखाई दे रही है। कोई राज्य ऐसा नहीं कह सकता कि ऐसे कुत्सित लोग उसके यहां नहीं है। चिकित्सा व्यवसाय से जुड़े लोग और विशेषकर सार्वजानिक क्षेत्र के अस्‍पतालों ने कोरोना महामारी के अब तक के लगभग सालभर से ज्यादा के समय में सराहनीय काम किया है। निजी चिकित्सालयों का भी बहुमत इसी श्रेणी का रहा है। लेकिन इसमें आपदा को अवसर बनाने वालों की भी नहीं  है, जो मनमाना पैसा ले रही है और कारवाई के भागी बन रहे हैं। रोज कहीं ना कहीं एफआईआर दर्ज हो रही है।  इसके बाद भी लोग इतना गिर चुके हैं कि बाज नहीं आ रहे हैं। इस समय जबकि देश के एक बहुत बड़े वर्ग के जीवन पर संकट है। उसकी रोजी रोटी के लाले हैं ऐसा अमानुषिक व्यवहार का प्रदर्शन लज्‍जास्‍पद है। अापदा आती और जाती है। इसी में अच्छी और बुरे की पहचान होती है।  ऐसे में कम से कम मानवता के उदात्त गुणों के तिलांजलि नहीं दी जानी चाहिए। दुर्भाग्य से यहां कुछ लोग ऐसा कर रहे हैं। इस पर हर संभव सख्‍त कारवाई की दरकार  है। कारण इसी पर मानवता का भविष्य आधारित है। हम हर व्यक्ति की दिल खोल कर सहायत करें, जो जिस तरह कर सकता है उस तरह  करे, वाजिब मेहनताना या शुल्क लें, इसे नाजायज कमाई का, मजबूर के शोषण का औजार ना बनाएं यही आज के इस बुरे दौर के लिए काफी है। एक बात और जो अब भी हमारी आबादी के एक बड़े वर्ग के समझ में नहीं आ रही है। वह है कोरोना से बचने के लिए उसके उपयुक्त 

व्यवहार को अंगीकार करने की है। आज भी लोग मास्क पहनने के, दूरी बनाने के, समय-समय पर हाथ धोने के, भीड़भाड़ में ना जाने के निर्देशों का अनुपालन नहीं कर रहे हैं। कोई ना कोई कहीं ना कहीं ऐसा मिल ही जाता है, जिसके व्यवहार से यह लग जाता है कि उसके लिए कोरोना कुछ है ही नहीं। ऐसे नादान लोगों पर जितना हो सकता है उतनी सख्ती वक्त की दरकार है। कारण कुछ सिरफिरे लोगों के चक्कर में वृहद मानवता को आपदा का भागीदार नहीं बनने दिया जा सकता। यह हम सब की सामूहिक बेपरवाही का प्रतिफल है, जो देश आज भुगत रहा है। देश के कोने-कोने से तड़प के,  पीड़ा की, मृत्यु  की हृदय विदारक तस्वीर समाने आ रही है और महमारी का तांडव हो रहा है। कम से कम  हमारे अपने ही लोग अपनी मुनाफाखोरी से, कालाबाजारी से, लापरवाही से 

इसमें और इजाफा कर अपने आपको और मानवता को कलंकित ना करें। यह अवसर अपने को किसी भी प्रकार से मालामाल करने का नहीं है, बल्कि एक दूसरे का हाथ पकड़कर, एक-दूसरे का संबल बनने का है और महामारी से बेदाग़ निकलने का है।  


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