गुपकार को बदलाव को अंगीकार करना होगा

जम्मू-कश्मीर में विपक्षी दलों के गठबंधन गुपकार ने गुरुवार को प्रधानमंत्री द्वारा आहूत जम्मू-कश्मीर के नेताओं की बैठक में शामिल होने का न्योता स्वीकार कर लिया है, लेकिन जिसमें शामिल दल अभी भी पुराना राग अलाप रहे हैं और पहले से ही  पाकिस्तान परस्ती के लिए कुख्यात उनकी एक नेता महबूबा मुफ्ती अभी भी पाकिस्तान से बात करो का राग अलाप रही हैं. उससे स्पष्ट है कि इन्हें अभी राज्य में दो साल पहले  हुए एतिहासिक बदलाव को आत्मसात करने में समय लगेगा. सच ही कहा गया है कि एक बार शेर के मुंह में आदमी का खून लग जाए तो वह घूम-घूम कर गांव का रुख करता है और यही उसकी समाप्ति का कारण बनता है. कुछ ऐसा ही हाल इन दलों का है, इनकी यानि महबूबा की पार्टी रोज टूट रही है. राज्य के जनता की नजरों में इनका अस्तित्‍व रोज घट रहा है, इन्होंने आर्टिकल 370 और 35 ए की आड़ में जमकर सत्‍ता का बारी-बारी से सुख भोगा और राज्य को, उसकी रियाया को गड्डे में जाने दिया. यह खुलेआम पाक के गीत गाते रहे, अलगाववादी कुछ भी कहते-बोलते रहें, राज्य में आतंक का नंगा नाच होता रहा, खुलेआम पाक के झंडे लहराए जाते रहें, सुरक्षा बलों को निशाना बनाया जाता रहा, यह कुछ नहीं कर पाए अब इनकी और इनके खानदान की मक्तेदारी खतरे में है तो बेचैन हैं. कारण बदलाव के बाद इनकी सच्चाई जनता के सामने रोज आ रही है. जनता विकास कैसे होता है यह देख रही है. आतंकी भाग रहे हैं या मारे जा रहे हैं, अलगाववादियों की मुश्के बंधी है. क्या अब यह फिर वही दिन वापस चाहते हैं, जब राज्य में अराजकता, हिंसा का नंगा नाच हो रहा था और ये, इनका परिवार और इनके चाटुकार सत्ता की मलाइ खा रहे थे. आर्टिकल 370 की आड़ में यह खेल दो साल पहले ही बंद हो चुका है, उसे दो साल बीत चुके हैं और यह अब उलट नहीं सकता. ये सारे निहित स्वार्थी तत्व मिलकर लड़े और भाजपा अकेले फिर भी स्थानीय निकाय में उसकी सबसे ज्यादा सीटें आईं मतलब साफ है कि राज्य की जनता भी इनके साथ नहीं है. उसका विश्वास ये खो चुके हैं जिस हकीकत को पूरा देश केंद्र सरकार जानती है. फिर भी इन्हें बातचीत का आमंत्रण इसलिए मिला है कि कैसे भी सही इन्होंने वहां की रियाया का नेतृत्‍व किया है और पुराने राजनीतिक दल हैं, तो इन्हें भी जम्मू-कश्मीर के नव निर्माण के अभियान का हिस्सा बनाया जाय तो अब इन्हें भी पुरानी रीति-नीति का त्याग कर बदलाव की हकीकत को स्वीकार करना चाहिए और राज्य और देश की जनता के मत का आदर करते हुए नए युग के मांग के अनुसार आचरण करना चाहिए. पुरानी राह और तेवर पर अटके रहने से इन्हें कुछ हासिल होगा, ऐसा नहीं लगता. जिस तरह की बात महबूबा कर रही हैं उसे सुनकर तो देश का जनमत उनके और खिलाफ होगा. यह समझ में ही नहीं आता कि वे अपनी पाक परस्ती से क्यों नहीं बाज आ रही हैं. जिस तरह इन नेताओं ने सशर्त बैठक में उपस्थित रहने की घोषणा की है यह भूल रहे हैं कि आज का भारत का नेतृत्व सुनता सबकी है और करता वही है जो देश के लिए जरूरी है, देश हिते में है. उसने जनता के नजरों की खारिज और जम्‍म-ूकश्‍मीर में जो कुछ गलत हुआ उसके प्रतीक बन चुके, इन पार्टियों के नेताओं को बातचीत के लिए इसलिए नहीं आमंत्रित किया है कि वे पाक के वकील बने या ऐसे लोगों को छुड़ाने की वकालत करें   जो आतंकियों से मिलीभगत होने के नाते या देशद्रोही गतिविधियों या विधानों के चलते जेल में हैं. यह राज्य में फिर पुरानी पद्धति लागू करने के लिए जोर लगाएं. यह सब अब इतिहास हो चुका है अन्य युग ने जम्मू-कश्मीर में ऐसे नए लोगों की कमी नहीं है, जो राजनीति में इनका सतना लेने और नए युग की मांग के अनुसार आचरण करने और काम करने के लिए अधीर हैं. केंद्र की सादृश्यता का फायदा उठाकर उनका वही पाक परस्त अलगाववादी और आतंकवादियों के समाने बेबस और परिवार का भला ही सबका भला वाली व्यवस्था बनाने का प्रयास उन्हें कहीं का नहीं छोड़ेगा. वह इतिहास बनने की राह पर है और ऐसा की करते रहे तो जल्द इतिहास बन जाएंगे. इसलिए बदलाव को हकीकत मान वैसा व्यवहार करें, इसी में उनका भला है, वरना हासिये पर जाने से कोई नहीं रोक पायेगा.


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