संदेहास्पाद स्‍थिति

आंकड़े बहुत मूल्यवान होते हैं, इसलिए उनका सटीक होना सदैव स्वागतयोग्य है। यदि बिहार में कोरोना से होने वाली मौतों की संख्या में अचानक बढ़ोतरी दिख रही है, तो कोई आश्चर्य नहीं। सरकार की यह पहल दूसरे राज्यों के लिए भी अनुकरणीय होनी चाहिए। पहले बिहार सरकार ने बताया था कि कोरोना की वजह से 5,529 लोगों की जान गई है, लेकिन महज एक दिन में यह आंकड़ा 9,429 पर पहुंच गया। ऐसा कतई नहीं कि एक दिन में 3,900 लोगों की कोरोना से जान गई है। दरअसल, इससे पता चलता है कि हम आंकड़ों को दुरुस्त रखने के प्रति पर्याप्त सजग नहीं हैं। मृतकों की संख्या में अचानक आई इस उछाल की वजह से राज्य में एक दिन में सबसे ज्यादा मौत दर्ज की गई है। इससे पूरे देश के आंकड़े में भी उछाल दिखा है और इस कारण से बिहार की ओर सबकी निगाह उठी है। आखिर ऐसा क्यों हुआ? शिकायत नई नहीं है, कोरोना संबंधी आंकड़ों में हेरफेर के आरोप लगते रहे हैं। विपक्षी दल मौत के आंकड़ों में हेरफेर के आरोप लगाते रहे हैं। अब चूंकि राज्य सरकार ने सुधार कर लिया है, तो आगे पूरी तरह से सचेत रहने की जरूरत है। ब्लॉक और जिला स्तर पर आंकड़ों को ठीक रखने या सुधारने की कवायद होनी चाहिए। आंकड़ों को दुरुस्त रखना इसलिए भी जरूरी है कि मुआवजों का वितरण न्यायपूर्ण ढंग से किया जा सके। कम से कम सरकार के स्तर पर तमाम आंकड़ों को एकत्र करने और जोड़ने का काम पूरी मुस्तैदी और ईमानदारी से हो। अगर आंकड़े सही नहीं होंगे, तो आने वाले दिनों में तरह-तरह की शिकायतें सामने आएंगी। अभी यह देखना चाहिए कि आंकड़ों को कैसे दुरुस्त किया गया है। क्या कुछ ऐसे जिले हैं, जहां से सही आंकड़े नहीं आ रहे थे? अगर ऐसे जिलों की पहचान करके निर्दिष्ट सुधार किए जाएं, तो आगे के लिए बेहतर होगा। एक शंका तो बन ही गई है कि ऐसे जिलों से आ रहे दूसरे आंकडे़ कितने जमीनी या विश्वसनीय होंगे? बिहार जैसे अपेक्षाकृत पिछड़े राज्यों में आंकड़ों का विशेष महत्व है, ताकि किसी भी योजना में आंकड़ा जनित कमी की वजह से नाकामी न हासिल हो। यह अच्छी बात है कि स्वास्थ्य विभाग ने कमी को स्वीकार किया है और उसे आगे ईमानदारी से जांच करनी चाहिए। संभव है, आने वाले दिनों में आंकड़ों को और सुधारा जाए। सरकार को केवल अपने स्तर पर ही गणना नहीं करनी चाहिए, उसे तमाम निजी और सामाजिक स्रोत भी इस्तेमाल करने चाहिए। बिहार सरकार ही नहीं, अन्य सरकारों को भी ध्यान रखना होगा कि भविष्य में असत्यता का कोई भी आरोप न लगे। कोई यह न कहे कि तत्कालीन सरकार ने मौतों के आंकड़ों को छिपा लिया था। यह तय है कि आज के सूचना प्रधान युग में आंकडे़ नहीं छिपेंगे। जैसे-जैसे जीवन सामान्य होगा, वैसे-वैसे समीक्षाएं तेज होंगी और आलोचना भी। आज सरकारें अपने आंकड़ों को जितना दुरुस्त रखेंगी, भविष्य में उनके लिए उतना ही अच्छा होगा। सरकारों को हर संभव तरीके से अपने आंकड़ों को ठीक करना होगा। मृतकों या पीड़ितों की सही गणना से आने वाले समय में अन्य महामारियों से लड़ने में हमें मदद मिलेगी। इसके अलावा अभी जो आंकड़े आ गए हैं, उनकी भी जमीनी जांच जरूरी है। सरकारों को सावधान रहना होगा कि आंकड़े किसी प्रकार के घोटाले का माध्यम न बनें।


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