आर्थिक प्रोत्साहन जरूरी

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने वित्त वर्ष 2020-21 में अर्थव्यवस्था की स्थिति को लेकर जो आंकडे़ जारी किए हैं, वे लगभग उसी तरह के हैं, जैसी अपेक्षा की जा रही थी। इस वित्त वर्ष में जीडीपी की वृद्धि दर -7.3 प्रतिशत रिकॉर्ड की गई, फरवरी में जो अनुमान लगाया गया था, वह -8 प्रतिशत का था, लेकिन सरकारी खर्च में काफी बढ़ोतरी की वजह से यह कुछ बेहतर हो गई। दरअसल, आखिरी तिमाही में जीडीपी 1.6 प्रतिशत बढ़ी, और यह बढ़ोतरी विनिर्माण क्षेत्र में तेजी आने की वजह से है। लेकिन जैसा कि हम सब देख रहे हैं, उसके तुरंत बाद महामारी की दूसरी लहर आ गई। हालांकि, इस लहर के दौरान पिछली बार की तरह सख्त लॉकडाउन तो नहीं हुआ, लेकिन कमजोर अर्थव्यवस्था के लिए इतना झटका भी काफी भारी पड़ सकता है।

देश में कोरोना फैलने के पहले भी भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं थी। वित्त वर्ष 2019-20 में जीडीपी की विकास दर चार प्रतिशत के आसपास थी और अगर असंगठित क्षेत्र का भी अनुमान लगाया जाए, तो हालात गंभीर ही थे। कोरोना ने इसे और बिगाड़ दिया है। सीएमआईई की ताजा रपट के मुताबिक, कोरोना के दौर में 97 प्रतिशत भारतीय परिवारों की आय घटी है और सिर्फ दूसरी लहर में ही लगभग एक करोड़ नौकरियां खत्म हुई हैं। उदारीकरण के दौर में जितने परिवार गरीबी रेखा के ऊपर आए थे, उस किए-कराए पर पिछले कुछ वक्त में ही पानी फिर गया है। जाहिर है, सरकार में बैठे लोग भी इन मुद्दों पर सोच ही रहे हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि इस स्थिति से उबरने के लिए फिलहाल किसी अतिरिक्त कोशिश की जरूरत नहीं है। उनका कहना है कि बजट में अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए जो उपाय किए गए हैं, उनका असर देखना चाहिए। चूंकि इस वित्त वर्ष के अभी दो महीने ही गुजरे हैं, इसलिए इस बजट की योजनाओं का असर दिखना धीरे-धीरे शुरू होगा। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यम का भी यह मानना है कि अर्थव्यवस्था तेजी से गति पकड़ सकती है, बशर्ते टीकाकरण बड़े पैमाने पर हो सके। यह भी सही है कि फिलहाल सरकार के पास विकल्प बहुत कम हैं। उसके आगे एक बड़ी समस्या यह भी है कि महंगाई तेजी से बढ़ रही है। मौजूदा एनडीए सरकार के कार्यकाल में विकास दर तो कम होती गई, लेकिन एक सौभाग्य यह रहा कि महंगाई की रफ्तार भी काफी कम रही,लेकिन अब दोहरा संकट है- कम विकास दर के साथ बढ़ी महंगाई। ऐसे में, नकदी की उपलब्धता बढ़ाने पर महंगाई के और ज्यादा बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है, जो देश में सबसे संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा बन जाता है। कई जानकारों का यह भी कहना है कि इस साल के बजट में अर्थव्यवस्था को गति देने के जो उपाय किए गए थे, वे तब सोचे गए थे, जब दूसरी लहर नहीं थी। दूसरी लहर ने पिछले सारे अनुमानों को बेअसर कर दिया है और नई परिस्थिति में अब नए लोगों को आर्थिक सहायता और प्रोत्साहन की जरूरत है। दूसरी लहर ने लोगों को कहीं ज्यादा सशंकित कर दिया है और इसकी वजह से बाजार में खर्च करने से वे अभी हिचकेंगे। इसलिए यही वक्त है, जब सरकार को नए नोट छापने और लोगों, खासकर देश के सबसे कमजोर वर्गों के हाथ में पैसे देने का फैसला करना चाहिए।


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