पहले स्वास्थ्य

धरती पर सभी लोग स्वस्थ हों, इससे बड़ा इंसान काे हासिल क्या हो सकता है! चाहे अमीर देश हों या गरीब देश, सब आज इसी चिंता में हैं कि स्वास्थ्य के मोर्चे पर दुनिया को कैसे सुरक्षित बनाया जाए। समूह सात के शिखर सम्मेलन में भारत ने ‘वन अर्थ-वन हेल्थ’ का मंत्र दिया है। भले पूरे समूह ने नहीं, लेकिन जर्मनी की चासंलर एजेंला मर्केल ने इस नारे का जोरदार समर्थन किया। वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ कहा कि आज दुनिया की पहली जरूरत धरती के हर नागरिक के लिए एक जैसे स्वास्थ्य की है। और यह तभी संभव हो पाएगा जब हर जगह स्वास्थ्य सुविधाएं भी एक जैसी हों।

लेकिन अभी देखें तो हालात एकदम उलट हैं। आधी से ज्यादा दुनिया गरीबी की मार झेल रही है। इससे तो कोई इंकार नहीं करेगा कि स्वास्थ्य, कुपोषण, भुखमरी जैसे संकट गरीबी की ही देन हैं और इसके लिए अमीर देशों की नीतियां ही काफी हद तक जिम्मेदार हैं। तब धरती पर हर नागरिक के स्वस्थ्य होने का सपना कैसे साकार हो, इस पर अब खुद को गरीबों का मसीहा कहने वाले देशों को सोचना पड़ेगा। गरीबी से छुटकारा पाए बिना तो ‘वन अर्थ-वन हेल्थ’ का नारा सपना बन कर रह जाएगा।

दुनिया महामारी के भयानक दौर से गुजर रही है। संकट अभी टला नहीं है। बस राहत की बात इतनी है कि विकसित देशों में टीकाकरण अभियान जोरों पर होने की वजह से संकट को साधने में मदद मिल गई है। लेकिन यह राहत चंद देशों में ही नजर आ रही है। गरीब और विकासशील देशों के हालात तो बता रहे हैं कि उन्हें अभी लंबा संघर्ष करना है। गरीब देशों में तो अभी जांच के भी इंतजाम नहीं हैं। जब भारत जैसा दुनिया का बड़ा टीका निर्माता खुद टीकों की भयानक कमी झेल रहा हो तो बाकी मुल्कों का क्या आलम होगा, इसका अनुमान सहज ही लग जाता है।

ज्यादातर टीका निर्माता कंपनियां अमेरिका और यूरोप की हैं। इनके टीके महंगे भी हैं और पहले ये अपने देशों की जरूरत पूरी करने में लगे हैं। ऐसे में समूह सात के देशों ने गरीब देशों को एक अरब टीके दान देने का जो एलान किया है, उसे फिलहाल बड़ी पहल के रूप में देखा जाना चाहिए। इससे यह भी झलकता है कि महामारी को लेकर विकसित देशों में किस कदर चिंता व्याप्त है। अमीर मुल्क अब इस हकीकत को समझ चुके हैं कि जब तक सभी देश महामारी से चंगुल से नहीं निकल जाते, तब तक वैश्विक अर्थव्यवस्था को पटरी पर ला पाना आसान नहीं होगा। इसमें कोई शक नहीं कि इस चिंता में उनके अपने हित नीहित हैं। समूह सात के देशों में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जर्मनी, जापान और कनाडा हैं। इन सभी ने कोरोना की भारी मार झेली है। इसलिए यह वक्त महामारी से सबक का भी है। जो देश टीका बनाने में अग्रणी हैं, उनकी प्राथमिकता यही होनी चाहिए कि बाजार और मुनाफे से परे हट कर दुनिया के उस हर देश को टीका मुहैया कराएं जो इसकी पहुंच से बाहर है। अपनी बात करें तो हमने भले टीकों की कमी का संकट झेल लिया हो, लेकिन अमेरिका सहित कई देशों को टीकों का निर्यात किया। जबकि अमेरिका जैसे देश ने ही टीके बनाने के लिए भारत को कच्चा माल देने से यह कहते हुए इंकार कर दिया था कि पहले हम अपनी जरूरत पूरी करेंगे। अगर अमीर देश इस रवैए के साथ चलेंगे तो धरती पर सबके समान स्वास्थ्य का लक्ष्य शायद ही कभी हासिल हो पाएगा।

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