लोकतंत्र का एक रूप यह भी

पारिवारिक पार्टियों का अंतिम हश्र क्या होता है यह लोजपा के हाल के घटनाक्रम अपने आप स्पष्ट कर देते है. चिराग पासवान बीमारी का इलाज करा रहे थे जब तक उन्हें पता चलता पूरी की पूरी पार्टी उनके पैरों के तले से खिसक चुकी थी, ना वे पार्टी के संसदीय दल के नेता रहे और ना ही अध्यक्ष ऐसे आश्चर्य हमारे देश में ही हो सकते हैं. कारण हमारे यहां व्यक्ति विशेष द्वारा संचालित पारिवारिक पार्टियों की भरमार है, जो राजनीतिक पार्टियां कम कंपनियां ज्यादा लगती हैं. जहां निर्णय लोकतांत्रिक तरीके से नहीं लिए जाते बल्कि पार्टी के मुखिया का फरमान चलता है, इन पार्टियों की यह खूबी है कि इनमें अधिकांश पदों पर परिवार के सदस्यों का बोलबाला रहता है, कब्जा रहता है. यह तब तक तो ठीकठाक चलता है जब तक मुखिया मजबूत रहता है, परन्तु मुखिया के कमजोर पड़ने पर या मुखिया द्वारा अपने पुत्र के उत्तराधिकारी बनाने पर अहं का टकराव शुरू हो जाता है और उसके बाद जो कुछ समाने आता है वह अखिलेश यादव और चिराग पासवान के रूप में सामने आता है. स्वर्गीय राम विलास पासवान ने अपने द्वारा स्थापित  पार्टी लोजपा का पुत्र को उत्तराधिकारी बना दिया. जब तक वे हयात में थे तब तक कोई बात नहीं थी. उनके जाने के बाद ही पुत्र इसी मूगालते में रहा की पार्टी तो उसकी बपौती है और मनमाने निर्णय लिए और बिहार में अकेले चुनाव लड़ा, अपने लोगों की बात भी नहीं सुनी और शून्य पर आउट हो गए. उसके बाद भी उन्होंने पार्टी में उनके विरुद्ध पनप रहे असंतोष की दखल नहीं ली. असंतोष कितना गहरा है इसका भान उन्हें तब हुआ जब जमीन उनके पैरों के नीचे से खिसक चुकी थी. अब आरोप-प्रत्यारोप का चिर-परिचित सिलसिला जारी है और जारी है वह दौड़ जो चुनाव आयोग और न्यायालय के द्वार तक जाती है. इससे कुछ हासिल होगा ऐसा नहीं लगता. कारण वे पार्टी के बहुमत का समर्थन खो चुके हैं यह प्रवृत्ति‍ सिर्फ लोजपा तक ही सीमित है ऐसा नहीं है सपा, बसपा, टीएमसी, टीआरएस, डीएमके इन सभी दलों का जो जातियों, वर्गों, क्षेत्रों और भाषाओं का चैंपियन बनकर सत्‍ता पर काबिज हुए हर जगह संस्थापक के उत्तराधिकारी उसके साथ खून पसीने बहाने वाले उसके सहयोगी नहीं है, बल्कि उनके पुत्र या परिवारजन हैं. इनमें जो काबिल निकला वह पार पा रहा है अथवा वह अखिलेश की तरह उसमें उलझा है या चिराग की तरह बाहर है या मायावती की तरह रोज-रोज अपने वरिष्ठ, जनाधार वाले नेताओं को कूड़ा करकट की तरह बाहर फेंक रहा है. प्रजातंत्र का यह पारिवारिक संस्थागत स्वरूप हमारे देश के लिए अनूठा है. यह सब नारा तो समाजवाद का देते हैं और अपने कार्यों से जातिवाद को समाप्त करने की बात करते हैं, लेकिन यथार्थ में अपने कार्यों से ये सब नकारात्‍मक बातों को बढाते ही हैं. समाजवाद के नाम पर अपने कुनबे में  ही एक अभिजात वर्ग खड़ा करते हैं, जो यह जानता है कि उसका भला जाति, धर्म, भाषा का विष बरकरार रखने में है, उसे समाप्त करने में नहीं.

हमारे प्रधानमंत्री अपने पहले के कार्यकाल से ही इसे निशाना बनाते आ रहे हैं. कारण  इसमें यथास्थिि‍तवाद का ऐसा रंग चढ़ गया है, जिसका टूटना जरूरी है. कारण वह परिवार की प्रधानता बनी रहे इसके लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है. चमचों को पालना, उनके हर अच्छे-बुरे काम को नजरंदाज करना, जाति विशेष को बढ़ावा देकर समाज में विखंडन पैदा करना, अपने मकसद के लिए भ्रष्‍टाचार को, सफेदपोश बने  अपराधी तत्वों को नजरअंदाज करना आदि तमाम बीमारियां हैं, जो राजनीतिक वंशवाद की उपज है. राहत की बात यह है कि इनमें से कुछ में तो बदलाव आ रहा है और वे सर्वसमावेशक राजनीति अपना रहे हैं जैसे तमिलनाडु और तेलंगाना लेकिन जो अभी भी पुरानी ढोल पीटने पर आमादा हैं उनके राज्यों की जागरुक जनता उन्हें हासिये पर कर रही है. इसमें अपवाद हुआ तो बंगाल का जहां ममता के परिवारवाद को भी जनता ने जिताया तो इसके पीछे उनकी शासन की सर्वसमावेशी नीति हो सकती है, खैर यह बहस का विषय है, लेकिन अब यह लगता है की राजनीति में सक्रिय परिवारों की कंपनियां जो लोकतंत्र का अजीबो-गरीब रूप देश में पेश कर रही हैं क्षरण की ओर हैं देखते हैं की नए युग के बदलाव की आंधी में कभी तक रुकते हैं.


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