पर्यावरण की रक्षा के लिए संकल्पबद्ध हों

आज विश्व पर्यावरण दिवस है. हमने और दुनिया ने विकास के नाम पर जितनी अनदेखी पर्यावरण की की है उतनी अनदेखी मानवता के इतिहास में अब तक किसी और वस्तु की नहीं हुई है. इसमें कई कारण हैं, लेकिन सर्वोपरि हमारी भूपिपासा और अज्ञानता रही है. देश और दुनिया की बढ़ती जनसंख्या ने खेती-बारी और आवास के लिए जमीन की मांग में भारी बढ़ोत्तरी की है और हम जो दुनिया की सर्वाधिक आबादी वाला दूसरा देश है इसकी आवश्यकता कुछ ज्यादा ही है. हमने वृक्षारोपण, जलसंचयन के परम्परागत तौर तरीकों सबकी अनदेखी की, जंगलों की अंधाधुंध कटाई की और जिसका परिणाम हमारे चारो ओर दिखाई दे रहा है और अब गांवों में भी पानी का तल नीचे जा रहा है और हवा भी प्रदूषित हो रही है. शहरों की अलग कहानी है, यहां पर्यावरण अनुकूल निर्माण की जिस तरह धज्जियां उड़ाई जाती हैं, किस तरह लैंड शार्क हर खाली जमीन पर अपनी नजर गड़ाए रहते हैं, यह सर्व विदित है. कंक्रीट के जंगल खड़ा करने के लिए किस तरह खुले स्थानों का जो बाग-बगीचे के लिए आरक्षित हैं अतिक्रमण होता है, कैसे तालाब पाटे जा रहे हैं या पट जाने दिया जा रहा है, आये दिन कहीं ना कहीं सुर्खियां बनती रहती हैं. शुद्ध हवा कितनी जरूरी है, इसका अंदाजा हमें इस कोरोना काल में हुआ है, जब कोरोना संक्रमितों को ऑक्सीजन की जरूरत पड़ी कुछ लाख लोगों को ऑक्सीजन देने में हमारी बात छोड़ों दुनिया के प्रगत से प्रगत राष्ट्र नाकाम रहें. हमारे देश में अभी हाल तक ऐसी ही ह्रदयविदारक ि‍स्थति रोज दिखाई पड़ रही थी. हमने पूरी शक्ति लगाई, दुनिया हमारे साथ खड़ी हुई तब जाकर स्थिति काबू में आई तब तक सैकड़ों की तादाद में लोग आॅक्सीजन के अभाव में दम तोड़ चुके थे. यह हमारी आंखें खोलने के लिए पर्याप्त होना चाहिए और इस पर्यावरण दिवस पर हम सबको यह संकल्प लेना चाहिए कि हम प्रकृति की उस नियामत को इतना मजबूत करेंगे जिसकी अनदेखी हर तरह के प्रदूषण को हमारी पहचान बना रही है और हमारे देश के नागरिकों के लिए तमाम तरह की परेशानियों का कारण बन रही है. वह ना हो और हम स्वस्‍थ और खुशहाल जीवन व्यतीत कर सकें इसके लिए हम सबको ऐसी जीवना शैली अपनानी होगी जो पर्यावरण के अनुकूल है, जिससे प्रकृति की नियामत का संरक्षण और संवर्धन हो सके, उसका क्षरण ना हो, ना ही उसमें ऐसी विद्रूपता आये जिससे वह धराधाम के जीवन के लिए अभिशाप बन जाए. इसलिए हम जहां तक संभव हो वहां तक उन परंपरागत तरीकों को अपनाएं, जिनसे हमारा काम भी चलता था और पर्यावरण भी चुस्त-दुरुस्त रहता था. उदाहरण के लिए कुओं से पानी का उपयोग, तालाब में पानी का इकट्ठा होना, जमीन के नीचे जल की नसों को ऊर्जावान करता रहता था. अब जिस तरह से आधुनिक तरीकों को अपना कर सिंचाई हो रही है या अन्य उपयोग हो रहे हैं यह प्रक्रिया प्रभावित हुई है और जल स्तर नीचे जा रहा है. इसी तरह नदियों के किनारों से जंगलों की अनाप-शनाप कटाई ने उनके प्रवाह को सिकोड़ना या कहीं-कहीं लुप्त करना शुरू कर दिया है. बारहमासी नदियां अब मौसमी नदी बन गयी हैं, सिर्फ बरसात में पानी रहता है, जहां है भी वहां नदी की धारा में गंदा पानी जाने देना और तमाम ऐसे क्रिया-कलाप होना जो उसके जीवन के लिए सही नहीं हैं, उसका अकथनीय नुकसान कर रहे हैं. संक्षेप में हमारे यहां हर तरह के प्रदूषण का बोलबाला है. ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण सब में हम खतरे के निशान पर हैं. पिछले तीन दशक से सरकारी अभियानाओं, गैर सरकारी संगठनों के प्रयासों आदि से काफी जागरूकता बड़ी है, प्लास्टिक के भी अंधाधुंध उपयोग पर रोक लगी है, परन्तु अभी भी ऐसी ि‍स्थति नहीं है कि हम शांत बैठ जाएं. अभी संतुलित पर्यावरण के लिए बहुत कुछ किया जान बाकी है. हम सबको वृक्षारोपण को लेकर, नदियों को प्रदूषित करने को लेकर, पर्यावरण प्रतिकूल उत्पादों के ना उपयोग करने को लेकर संकल्पबद्ध होकर काम करने की जरूरत है, तभी बात बनेगी. 


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