समितियों से कांग्रेस का भला नहीं होगा

हाल ही में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में  भूसपाट कांग्रेस पार्टी की हार के कारणों का पता लगाने के लिए कांग्रेस आलाकमान ने कांग्रेस के महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेता अशोक चव्हाण के नेतृत्व में एक समिति गठित की थी, जिसने अपनी रिपोर्ट कांग्रेस आलाकमान के सुपुर्द कर दी है. इस रिपोर्ट में पार्टी में व्याप्त गुटवाद, लचर उम्मीदवार  चयन, अनुभवी नेताओं की नजरअंदाजी और जिम्मेदार नेताओं  की मनमानी को पार्टी की हार का प्रमुख कारण बताया गया है. जिसने पार्टी का सूपड़ा साफ कर दिया और एक जमाने की अखिल भारतीय पार्टी बंगाल जैसे राज्य में खाता भी नहीं खोल पाई, जहां वह पिछली बार मुख्य विपक्षी दल थी. अब दूसरे राउंड में भी पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव चंद महीनें दूर हैं. भाजपा हो या सपा, बसपा सबने अपने-अपने राज्यों में हलचल शुरू कर दी है, लेकिन कांग्रेस खेमे में चाहे वह पंजाब हो या राजस्थान या छत्तीसगढ़ सिर्फ और सिर्फ नेताओं के विद्रोह जूतम पैजार सुनाई दे रही है. आलाकमान सिर्फ पानी पी-पी कर प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार को कोसने में ही अपनी सारी ऊर्जा लगा रहा है. इस दृि‍ष्ट से राहुल गांधी का जोश काबिले तारीफ है. वह ऐसे सेनानी लगते हैं, जो युद्ध में कूदने के लिए चौबीस घंटे तैयार हैं, लेकिन उसकी सेना का मनोबल कैसा है, वह एकजुट है या नहीं, वह लड़ाई के लिये वांछित ज्ञान में सुसज्ज और प्रशिक्षित है या नहीं इससे उनका कोई लेना-देना नहीं है. ऐसा नहीं लगता गत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में बंगाल को छोड़ दें तो तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में राहुल गांधी ने मेहनत की. समुद्र में छलांग लगाने से लेकर मछली पकड़ने तक का कौशल प्रदर्शित किया, जलीकट्टू का आनंद  उठाया, परन्तु परिणाम के खाते में सिर्फ निराशा ही हाथ लगी. कारण देश के अधिकांश राज्यों में संगठन नदारद है और जहां है, वहां सिर्फ और सिर्फ एक ही काम हो रहा है वह है गुटवाद  भाई-भतीजावाद. किसी को भी पार्टी को समग्र रूप से देखने की पड़ी ही नहीं है. पार्टी गुटीय विवाद के चलते मध्य प्रदेश की अपनी सरकार गवां चुकी है और राजस्थान की जाते-जाते बची है. लेकिन पार्टी ने उससे कोई सबक लिया है ऐसा नहीं लगता. आज जिस तरह की स्थिति पंजाब और राजस्थान में है, वहां कभी भी कुछ उल्टा-सीधा हो सकता है. पार्टी की यह खस्ता हालत यूपीए-2 के दौरान ही दिखाई देने लगी थी और 2014 की शिकस्त के बाद पार्टी उससे उबर ही नहीं पाई है. कारण पार्टी का ध्यान संगठन की ओर उस तरह जा ही नहीं रहा है जैसा जाना चाहिए, जो विश्लेषण अशोक चव्हाण समिति ने किया है पार्टी में इस ओर आलाकमान का ध्यान जी-23 के नेता और पार्टी के भविष्य को लेकर चिंतित अन्य नेता सतत आकर्षित करते रहे हैं, लेकिन आलाकमान इस ओर अपनी नजरें इनायत ही नहीं कर रहा है, तो कोई क्या कर सकता है. यदि उसे लगता है कि सरकार पर नित नए आरोप लगाने से ही पार्टी का भला हो सकता है, तो कोई और कितना भी प्रयास कर ले वह वही करता रहेगा और यही कांग्रेस पार्टी की शोकांतिका है कि उसके आलाकमान और उसके सलाहकारों को यह पता ही नहीं चल रहा है कि पार्टी का पुनरोत्थान कैसे होगा. उनकी कार्रवाइयों से पार्टी और गर्त में जा रही है और आज तो उसके अस्तित्व पर ही खतरा मडराने लगा है. कारण आज पार्टी कार्यकार्ताओं के पास कोई दिशा है, ना ही मनोबल और ना ही अनुशासन है. पार्टी आलाकमान ऐसा देशव्यापी ढांचा खड़ा करने में नाकाम हैं, जिस पर पार्टी की मजबूत देशव्यापी इमारत खड़ी की जा सके. कारण वह हर जगह निहित स्वार्थी नेताओं की धीगामस्ती को नियंत्रित करने में नाकाम है. जिसको जो समझ में आ रहा है वह कर रहा है, जिसकी जहां चल रही चला रहा है ना उसे पार्टी से कोई लेना- देना है, ना कार्यकर्त्ता से. वह सिर्फ अपना अपने चमचों का और अपने परिवार का भला देख रहा है. इससे पार्टी का कल्याण नहीं होगा. समितियां बहुत बनीं हैं, लेकिन उनकी रिपोर्ट पर कार्रवाई भी जरूरी है, कांग्रेस जब तक यह नहीं करेगी, सख्ती से गुटवाद का इलाज नहीं करेगी, पार्टी में अनुशाषित लक्ष्य आधारित काम नहीं होगा, उसे इतिहास बनने से कोई रोक नहीं सकेगा. यह आलाकमान के जितना जल्द समझ में आ जाए अच्छा, नहीं तो उसका बेड़ा रोज गर्क हो रहा है.  


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