चौकड़ी से एक और आउट

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की चिर परिचित चौकड़ी के एक और सिपहसलार बुधवार को भाजपा के हो गए. राहुल गांधी के इर्द-गिर्द रहने वाले और उनके खासमखास माने जाने वाले चार लोगों में ज्योतिरादित्य सिंधिया,जितिन प्रसाद, सचिन पायलट और मिलिंद देवरा की गणना होती रही है, इसमें ज्योतिरादित्य पहले ही पार्टी को टाटा कह चुके हैं और अपने साथ मध्यप्रदेश की सरकार भी ले गए, सचिन अभी कुछ दिन पहले ही बगावत का बिगुल बजाये थे, परन्तु सफल नहीं हो पाए, ि‍जतिन पिछले लम्बे समय से पार्टी की हालत और अपने राजनीति भविष्य को लेकर चिंतित थे, पहले ही उनके जाने की हवा उठह थी जो प्रियंका के प्रयासों से रुक गयी थी, लेकिन वे पार्टी में बेचैन थे और अब आखिरकार उन्होंने पार्टी को टाटा कहकर भाजपा का दामन पकड़ लिया है. रही बात सचिन की तो उनकी भी बेचैनी जब तब आहर आती रहती है और कब वे क्या करेंगे कहा नहीं जा सकता. फिलहाल मिलिंद देवरा ही हसंत बैठे दिख रहे हैं, कल क्या हो कोई नहीं जानता. अब प्रश्न यह है की ऐसे लोग जिनका कई पीढ़ियों से कांग्रेस से जुड़ाव रहा है, पार्टी को जिन्होंने अपनी सेवाएं दी हैं और जिन्हें पार्टी ने भी भरपूर सम्मान दिया है, पदों से नवाजा है और जो पार्टी आलाकमान के ब्लू आइड बॉय रहे हैं आज क्यों पार्टी को टाटा कह रहे हैं या बेचैन हैं? कांग्रेस आलाकमान और राहुल गांधी को इसी बेचैनी का कारण खोजना होगा और उसका इलाज करना होगा, जो करने में वह पूर्णत: विफल नजर आ रही है. मोदी युग में कांग्रेस के युग के कई मिथक टूटे हैं, कई बातें जो कांग्रेस काल में असम्भव लगती थी आज हकीकत में तब्दील हो चुकी हैं. संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि देश में राजनीति करने का तौर-तरीका और एजेंडा सब बदल गया है. अल्पसंख्यक वाद, परिवार वाद सब पर आज एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लग चुका है. पार्टी शिकस्त पर शिकस्त खाती जा रही है, लेकिन कोई कार्रवाई होती नहीं दिख रही है. पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम ने इस बेचैनी को और बढ़ाया है. अभी इस हार को पार्टी संभाल ही नहीं पा रही है की और कई राज्यों के चुनाव पार्टी के द्वार पर दस्तक दे रहे हैं. राजस्थान, पंजाब सर्वत्र असंतोष उफन-उफन कर बाहर आ रहा है.

यह असंतोष और बेचैनी आम कांग्रेस जन में है, लेकिन उफनकर बाहर उन खास जनों के मध्य से आ रही है, जिन्होंने पार्टी के स्वर्णकाल में पार्टी ने काफी कुछ दिया है और पीढ़ी दर पीढ़ी दिया है और आज भी पार्टी में खास महत्व पाते हैं या खास पदों पर हैं, इनमें बेचैनी या भगदड़ विशेष रूप से काबिले गौर है. इसका मतलब है कि इन्हें आज पार्टी वह सब प्रदान करती नहीं दिख रही है जिसे ये अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते थे, यानि सत्ता से दूरी, पार्टी की चुनाव जीतने या जितवाने की अक्षमता. कांग्रेस आलाकमान को अब उन कारणों की खोज करनी होगी जो पार्टी को इस कदर दीन-हीन बना रहे हैं की पीढ़ियों तक उससे जुड़े लोग आज उसे इसलिए छोड़ रहे हैं की पार्टी अपनी अतीत की ऊंचाई पुन: हासिल करने के लिए कुछ करती ही नजर नहीं आ रही. सार यह है कि अब इन नेताओं की पार्टी युवराज और आलाकमान खासमखास और चहेता होने के बावजूद भी इन्हें पार्टी में अपना कोई भविष्य नहीं दिख रहा है. जिस भी पार्टी में ऐसी ि‍स्थति होगी वहां ऐसा ही सूरते हाल नजर आयेगा. कांग्रेस पार्टी और उसका आलाकमान सब कर रहा है, लेकिन पार्टी संगठन को देश भर में मजबूती से खड़ा करने का, उसकी विचारधारा में वक्त के साथ लगी काई को साफ़ करने का, बैसाखियों की बजाय अपने दम पर देश भर में खड़ा होने का, नेताओं की नई पौध के विकसित होने का अवसर देने का काम करना दशकों पहले बंद कर दिया है. जब तक सत्ता थी तब तक सब दबा रहा अब एक-एक कर बाहर आ रहा है. लेकिन कांग्रेस के कर्ता-धर्ताओं का ध्यान ही इस ओर नहीं है, उनकी तो सारी ताकत अध्यक्ष पद का चुनाव टालने में लगी है. जब पूर्ण कालिक अध्यक्ष ही नहीं होगा तो बकाए उपरोक्त काम कैसे होगे. और यदि उपरोक्त सुधारात्मक कदम नहीं उठेंगे तो पार्टी कैसे उठेगी तो असंतोष और भगदड़ स्वाभाविक है,  यदि इसे रोकना है तो नेतृत्‍व और पार्टी को उस तरह काम करना होगा नहीं तो जितिन प्रसाद शुरुआत है अभी तो ना जाने कितने प्रसाद मौके की ताक में हैं, यदि समय रहते कदम नही उठे तो तांता लग सकता है.


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