चिराग के घर में छाया अंधेरा

Chirag paswan

पटना

चिराग पासवान का अंतिम दांव भी फेल हो गया है। बागी हुए चाचा पशुपति पारस से मिलने गए चिराग की पारस से मुलाकात नहीं हो सकी। चिराग अपनी मां को लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव लेकर पारस से मिलने पहुंचे थे। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने पशुपति पारस को एलजेपी संसदीय दल का नेता होने पर मुहर लगा दी है। पहले पार्टी के पांचों सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला से मुलाकात कर उन्हें पार्टी के संसदीय बोर्ड की बैठक में लिए फैसले की जानकारी दे दी थी। बैठक में पशुपति कुमार पारस को सर्वसम्मति से पार्टी का नेता और संसदीय दल का अध्यक्ष चुन लिया गया था। साथ ही चौधरी महबूब अली कैसर को उपनेता चुना गया।

इससे पहले एलजेपी में टूट के बाद चिराग पासवान राष्ट्रीय अध्यक्ष पद छोड़ने को तैयार हो गए थे। सोमवार सुबह चिराग अपने चाचा पशुपति पारस से मिलने पहुंचे थे। डेढ़ घंटे घर के बाहर खड़े रहने के बाद उन्हें अंदर आने की परमिशन मिली, लेकिन मुलाकात नहीं हो सकी। चाचा को मनाने के लिए चिराग ने अपनी मां को आगे किया। पारिवारिक मुलाकात के जरिए बात सुलझाने की कोशिश की, लेकिन पशुपति के पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद चिराग का दांव फेल हो गया।

ललन सिंह की भूमिका अहम 

एलजेपी में फूट डालने की भूमिका लिखने में बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के करीबी और जदयू सांसद ललन सिंह की अहम भू‍मिका रही। यह भी बताया जा रहा है कि दो और जदयू नेताओं ने भी इसमें अहम रोल निभाया। एलजेपी का नया राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष बनते ही पशुपति कुमार पारस ने अपने साथियों के साथ तुरंत ललन सिंह से उनके बंगले पर जाकर मुलाकात की। इससे यह बात पूरी तरह पक्‍की हो जाती है। 

वैसे इस पूरी कवायद को अंजाम देने में बिहार विधानसभा के उपाध्‍यक्ष और जदयू विधायक महेश्‍वर हजारी के साथ ही एक और नेता के भी मददगार होने की चर्चाएं चल रही हैं। अंदरखाने चल रही चर्चाओं के मुताबिक सूरजभान सिंह ने भी इस बदलाव में भूमिका निभाई। 

बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान भी चिराग पासवान ने अपने पार्टी नेताओं की राय के उलट रणनीति बनाई। 

चुनाव में करारी हार के बाद भी चिराग ने अपने नेताओं को विश्‍वास में लेना उचित नहीं समझा और अपनी रणनीति पर कायम रहे। 


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