आखिर किस इंतजार में हैं किसान नेता

कीसान आंदोलन को शुरू हुए काफी लंबा समय बीत चुका है। इस दौरान आन्दोलन का दायरा और स्वरूप दोनों सिमटता जा रहा है। देश के अधिकांश भाग से अब वैसा  समर्थन नहीं मिल रहा है, जैसा उसे आन्दोलन के उषाकाल में मिल रहा था। इस दौरान   लाल किला पर जो कुछ हुआ उसे देश -दुनिया ने देखा,जो किसी भी तरह से सही नहीं कहा जा सकता। तब से लेकर आज तक सरकार और आंदोलनकारी दोनों अपनी- अपनी भूमिका पर कायम हैं। एक और आंदोलनकारी रद्द करो - रद्द करो  की तोता रटंत लगाए हुए है। इससे कम पर मानने को तैयार नहीं है, तो वहीं सरकार भी यह एकाधिक बार कह चुकी है कि कानून वापस नहीं हो सकता। हां उसके किसी भी बिंदु को लेकर यदि कोई आशंका है ,भय है तो उस पर बातचीत करने को सरकार तैयार है। यह बात केंद्रीय कृषि  मंत्री और अन्य जिम्मेदार लोग सतत  कहते आये हैं। एमएसपी को लेकर भी सरकार  किसानों द्वारा हर आशंका को निर्मूल साबित कर चुकी है, साथ ही पूरी तरह आश्वस्त किया है कि एमएसपी कभी  नहीं निरस्त की जाएगी जो सर्वथा तर्कसंगत और उचित है। इसके बाद भी किसान नेताओं का रद्द करो, रद्द करों की जिद्द पर अड़े रहना समझ से परे है । इससे उनके आंदोलन को लेकर कई तरह की  शंकाएं समाने आती हैं और उन चर्चाओं को बल प्रदान करती हैं कि उनका एजेंडा किसान कल्याण ना होकर कुछ और है और जैसे -जैसे यह आशंका प्रबल हो रही है वैसे -वैसे इनका समर्थन भी घट रहा है। अभी तक इनके सशक्त समर्थक शरद पवार ने भी बातचीत के मार्फत लगभग तीन माह से ज्यादा समय से चल रहे इस गतिरोध को समाप्त किये जाने की आवश्यकता जताई है। यह एक तरह से केंद्र सरकार की भूमिका का समर्थन है। स्वाभाविक है इसका केंद्रीय कृषि मंत्री ने स्वागत किया है,यह किसान नेताओं  की हठधर्मिता का ही परिणाम है कि पवार जैसे उसके समर्थक भी  अब सरकार के सुर में सुर मिलाते नजर आ रहे हैं, ऐसे में यह जरूरी है कि किसान नेता उनके आन्दोलन की गरिमा की रक्षा करें और आंदोलन को इतना मत खींचे की वह अपना औचित्य और उपयोगिता खो दें और अप्रासंगिक हो जाए। सरकार उनकी मांगों को लेकर जो कह रह रही है, वह देश को सही लग रहा है जब वह उनकी सभी आशंकाओं को लेकर   बातचीत करने को तैयार हैं तो आखिर ये बात करने से क्यों कतरा रहे हैं। यदि बातचीत से उनका समाधान नहीं होता तब व आन्दोलन को आगे बढ़ा सकते हैं, उनका अपनी मांग पर अड़े रहना और बातचीत से दूर भागना उन्ही चर्चाओं को बल प्रदान करेगा और उसकी पुष्टि करेगा की इनका कोई और छुपा एजेंडा है। यह किसानों के कल्याण के लिए आन्दोलन नहीं कर रहे है, बल्कि यह आन्दोलन किसी सोची समझी राजनीति का हिस्सा है। किसान हमारी जनसंख्या का महत्व पूर्ण घटक है, उसके नाम पर आजादी से लेकर आज तक हमेशा इस देश में बहुत राजनीति हुई है, उसका रहनुमा बनकर कई लोगों ने  राजनीति में काफी बड़े -बड़े मुकाम हासिल किये, परन्तु किसानों की दशा हमेशा सोचनीय बनी रही। निहित स्वार्थी तत्व मजा लूटते रहे,पैबंद लगाकर उनके जीवन में उजाला करने के आधे अधूरे प्रयास हमेशा नाकाम हुए । पहली बार किसी सरकार ने इस पर पूरी तरह विचार कर एक व्यवस्था बनाई है। उस व्यवस्था में कुछ आपत्ति हो सकती है तो सरकार उसके लिए भी तैयार है। यदि आपको कोई आपत्ति है, आशंका है तो आइये बैठते हैं और उसका समाधान निकालते हैं। इसके बाद भी आप सिर्फ और सिर्फ निरस्त करने की बात ही नहीं कर रहे हैं, उस पर अड़े हुए हैं , जो सर्वथा अनुचित है। इसलिए इसके पहले की उनका आन्दोलन अपने आप अपनी महत्ता खो दे, उन्हें किसानों के प्रति अपने उत्तरदायित्व का ध्यान रखते हुए उन आशंकाओं का, आपत्तियों का निराकरण करने के लिए बातचीत के लिए सरकार द्वारा दिए जा रहे प्रस्तवा को स्वीकर करें आखिर इन्तजार किस बात का है।


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