जनसंख्या नियंत्रण वक्त की मांग

आज दुनिया का हर छठा आदमी भारतीय है. दुनिया की देशों में आबादी के लिहाज से हम चीन के बाद दूसरे स्थान पर हैं. देश और दुनिया में हमारे लोगों की कुशलता का, कार्यक्षमता का डंका बज रहा है. सब सही है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि देश-दुनिया में डंका बजने के बाद भी आज भी हमारे देश में ऐसे लोगों की बहुत बड़ी आबादी है, जिन्हें उनके जीवन के समुचित विकास के लिए जिस मूलभूत सुविधाओं की, जिस स्तर और पैमाने पर आवश्यकता है नहीं उपलब्ध है. इसका सबसे बड़ा कारण बढ़ती जनसंख्या का दबाव है, हमारे देश ने आजादी के बाद के दशकों के हर क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है. लेकिन जनसंख्या प्रगति की गति के हिसाब से कई गुना ज्यादा बढ़ी है, जो सारी प्रगति को बैलेंस कर देती है. 

गौरतलब है कि 1930 में जब पूरा भारत एक था मसलन आज का पाकिस्तान, बांग्लादेश सब उसका हिस्सा थे तब देश की आबादी 30 करोड़ थी और आज जबकि पाकिस्तान, बांग्लादेश अलग है हमारी आबादी 135 करोड़ का आंकड़ा पार कर रही है. साफ है कि जिस तरह से आबादी बढ़ रही है उस तरह जमीन नहीं बढ़ सकती, वह जो है उतनी ही रहेगी. सबके लिए यथोचित भोजन, वस्त्र, आवास चिकित्सा, शिक्षा की व्यवस्था करना एक चुनौती है और जिन्हें पूरा करना आसान नहीं है. आज इलाज पढ़ाई-लिखाई सब दिनों-दिन महंगा होता जा रहा है. आवास की आवश्यकता जगलों की कटाई और खुले स्थानों के अतिक्रमण का कारण बन रही है, जो पर्यावरण की बड़ी समस्या के रूप में सामने आ रही है. सरकार का पूरा ध्यान बढ़ती आबादी के भरण-पोषण की ओर ही लगा रहता है और शोध और अनुसंधान आदि के जो कार्य प्राथमिकता पर होने चाहिए पीछे रह जाते हैं. हां, आज हमने दुनिया के मानव बल आपूर्तिकर्ता के रूप में एक नयी पहचान बनाई है. साथ ही मोदी युग के हमारे युवाओं को दक्ष बनाने की दिशा में, उसका कौशल विकसित करने की दिशा में ठोस कदम उठे हैं, लेकिन सब कुछ करने के बावजूद बढ़ती जनसंख्या वह बात नहीं बनने दे रही है, जो होनी चाहिये. तो इस विषय पर अब गंभीरतापूर्वक विचार और कार्य करने की जरूरत है. 1977 में तत्कालीन सरकार ने इस दिशा में काफी कठोर भूमिका ली थी, जिसका असर भी उस सरकार के लिए नकारात्मक हुआ था. लेकिन देश में इस बिंदु को लेकर जागरुकता बढ़ी एक बड़े वर्ग ने छोटी परिवार की महत्‍ता समझी और परिवार नियोजन अपनाया, लेकिन उसकी गति काफी कम है. अभी भी हमारे समाज में लड़का-लड़की में भेदभाव या धर्म विशेष की ऐसी धारणा की बच्चे खुदा की नियामत हैं आदि लोगों द्वारा परिवार नियोजन को ना अपनाने का सबसे बड़ा कारण बन रहा है, तो लोगों की ऐसी पुरातनपंथी और पीछे ले जाने वाली सोच को बदलने के लिए अब कुछ वैधानिक प्रावधान करने की भी जरूरत महसूस की जा रही है. जन जागरण, समझाइश सब कर देख लिया गया, उसका असर नहीं पड़ा ऐसी बात नहीं है, लेकिन उसकी रफ्‍तार काफी कम है और जनसंख्या का दबाव दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है, तो इस पर अब देशव्यापी नीति निर्धारण और उसका सख्त अनुपालन वक्त की मांग है और वह हर भारतीय पर वह चाहे जिस जाति,धर्म, क्षेत्र या भाषा का हो पर कड़ाई से लागू हो. यह देश हित में जरूरी है. असम और उत्तर प्रदेश सरकार ने तो इस दिशा में सोचना भी शुरू कर दिया है और कानून मसविदा पर भी विचार हो रहा है यदि देश का हर नागरिक सही तरीके से परिवार नियोजन को अपनाता है, तो इससे देश के प्रगति पथ पर जो इसकी सतह बढ़ोत्तरी अवरोधक बन जाती है वह अपने आप दूर होगा और देश को कई तरह की नकारात्‍मकता से भी छुटकारा मिलेगा. इस दिशा में काफी तेज कदम उठाने की जरूरत है साथ ही समाज के हर वर्ग को भी उन धारणाओं के खिलाफ जैसे लड़का-लड़की में भेद और बच्‍चे भगवान की कृपा है में बदलाव लाने के लिए भी अभियान छेड़ना होगा, कारण जनसंख्या की बढ़ोत्तरी में प्रकोष रूप से ऐसी कुमान्यताएं भी कम जिम्मेदार नहीं हैं. हम सब को इस बात का एहसास करना होगा कि जनसंख्या की बेरोक-टोक वृ‌िद्ध हमारी समस्याओं के लिए एक बड़ा कारण है. इसे अपनाकर हम देश की प्रगति यात्र को काफी गतिमान कर सकते हैं. 


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