कुछ सोचना होगा, कुछ करना होगा

अतिवृष्टि ने चंद दिनों में ही राज्य की बड़ी आबादी को बेघरबार कर दिया और हादसे में अपनी जान गंवाने वालों का आंकड़ा भी सैंकड़ा पार कर गया. अपने परिजनों को अपना घरबार गंवाने वालों का ह्रदय विदारक दृश्य विचलित, करने वाला है. केंद्र से लेकर राज्य तक हादसा का शिकार हुए लोगों को राहत पहुंचाने का, उन्हें अपनी गृहस्थी पुन: बसाने के लिए मदद देने की घोषणा हो रही है. मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, राज्य के सत्ता पक्ष, विपक्ष के आला नेता, नौकरशाही सब मुस्तैद हैं, अच्छी बात है. एनडीआरएफ की टीमें और सेना के जवान हर संभव सहायता उपलब्ध कराने के लिए प्रयत्न की पराकाष्ठा कर रहे हैं. यह सब बड़ी अच्छी बातें हैं, लेकिन प्रश्न यह है कि सिर्फ आपदा के बाद ही सक्रिय होने की जो हमारी कार्यप्रणाली है वह कितना सही है. क्या उसके पूर्व  अध्ययन, विश्लेषण और पूर्वानुमान से ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जा सकता, जिससे आपदा के समय में होने वाले असीम पीड़ादायक जन और धन हानि से बचा जा सके. इस ओर हमारे केंद्र और राज्य के नीति नियंताओं को विचार करने की जरूरत है. आपदा प्राकृतिक हो या मानवीय जब तक मानव जीवन है आनी है, लेकिन मानवीय सावधानी से, नियोजन से उसे आफत में बदलने से नि:संदेह रोका जा सकता है. उदाहरण के लिए मुंबई को ही ले लें हर साल खतरनाक भवनों की, खतरनाक झुग्गियों की, जगहों की सूची जारी होती है फिर भी कहीं ना कहीं हर साल बिल्डिंग गिरती है, भूस्खलन या पहाड़ी गिरने से लोगों के जान-माल का नुकसान होता है, परिवार के परिवार  समाप्त हो जाते हैं, लेकिन उन्हें उन जगहों से हटाने का, उन्हें  सुरक्षित विकल्प उपलब्ध कराने का कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया जाता, उल्टा यह कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता है कि लोग हटते ही नहीं. तो फिर सरकार किस लिए है, वह सूची निकालने का दिखावा क्यों करती है, जब उसे सूची निकालकर ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेना है. देश और दुनिया में बारिश का तरीका बदला है, उसका भी प्रमुख कारण इस धराधाम के वासियों द्वारा प्रकृति का अनुचित संदोहन और पर्यावरण प्रतिकूल आचरण और व्यवहार है. अब बहुत ही कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होने का ट्रेंड है, तो हमें उसका सामना करने के लिए वैसी ही तैयारी भी करनी होगी, नहीं तो इस माहौल में जब देश और राज्य के हर शहर पहली ही जोरदार बारिश में बाढ़ प्रभावित कछार नजर आते हैं तो ग्रामीण इलाकों का क्या कहना. अभी कुछ वर्ष पहले कोकण में रातों-रात एक गांव के नक़्शे से गायब होने का घाव भरा नहीं था अब दूसरा गांव भी वैसा ही दु:खद और त्रासद पीड़ा दे रहा है. जिस तरह का दारूण दृश्‍य वहां नजर आ रहा है। वह किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को स्तब्ध करने के लिए काफी है। हम आपदा के समय में अतिसक्रिय हो जाते हैं। प्रभावितों को राहत पहुंचाने के लिए हर संभव कदम उठाते हैं उन्हें फिर से बसाने के लिए, अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए, उनके आंसू पोंछने के लिए हर संभव प्रयत्न करते हैं यह अभिनन्दन और गर्व की बात है, लेकिन उसके साथ सामन्य समय के भी इसी तरह सक्रिय रहने की जरूरत है. ऐसी कार्य योजना बनाने और उसका सख्ती से अनुपालन करने की जरूरत है. जिससे अनावृष्टि और अतिवृष्टि जैसी प्राकृतिक आपदाएं जिन्हें रोकना हमारे वश में नहीं है वह आफत में तब्दील होकर जन-धन को नुकसान ना पहुंचा सकें. हर साल बारिश के पहले पूरे राज्य में, हर स्थानीय निकाय स्तर पर बड़ी-बड़ी तैयारी होती हैं. पानी जन-जीवन बेहाल नहीं करेगा इसके बड़े-बड़े दावे होते हैं, सड़कें गड्ढे मुक्त रहेगी उसके लिए अभिनव योजनाएं बनाई जाती हैं और पहली ही बारिश सब दावों की पोल खोलकर रख देती है. आम-ख़ास सब तरह-तरह की परेशानी झेलते हैं, जान पर आफत बनी रहती है। इसके लिए जरूरी है की जैसी सक्रियता हमारा प्रशासन और सरकार आपदा के समय में दिखाता है उतना ही सक्रिय वह सामान्य समय में भी रहे और उस दौरान अपने विगत के अनुभव के आधार पर ऐसी योजना बनाएं और उनका ईमानदारी से क्रियान्वयन करे, जिससे जो राज्य के बड़े हिस्से में अपादा आफत बनकर तांडव कर रही है, परिवार के परिवार खत्म हुए है और घर द्वार समाप्त हो गया है या हो रहा है ऐसा न हो. 


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