हिंसा पर घिरी ममता सरकार


कोलकाता

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद हिंसा पर अपनी रिपोर्ट कलकत्ता उच्च न्यायालय की पांच-न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष प्रस्तुत की। इसमें कहा गया है कि राज्य में हिंसक घटनाओं में पीड़ितों की दुर्दशा के प्रति राज्य सरकार की भयावह उदासीनता है, राज्य में कानून का शासन नहीं चलता बल्कि शासक का कानून चलता है। हिंसा के मामलों की जांच राज्य से बाहर या सीबीआई से कराई जानी चाहिए। 

आयोग ने कहा है कि यह मुख्य विपक्षी दल के समर्थकों के खिलाफ सत्ताधारी पार्टी के समर्थकों द्वारा की गई प्रतिशोधात्मक हिंसा थी। इसके परिणामस्वरूप हजारों लोगों के जीवन और आजीविका में बाधा उत्पन्न की गई और उनका आर्थिक रूप से गला घोंट दिया गया। 

रिपोर्ट को लेकर ममता बनर्जी ने  कहा कि अदालत में इसकी रिपोर्ट जमा करने के बजाय उन्होंने इसे लीक कर दिया है। उन्हें अदालत का सम्मान करना चाहिए। यदि यह राजनीतिक प्रतिशोध नहीं है तो वे रिपोर्ट कैसे लीक कर सकते हैं? वे ऐसा करके बंगाल के लोगों को बदनाम कर रहे हैं। 

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गुरुवार को कहा कि अब जब कोरोना के मामले कम होने लगे हैं तब मैं अब संसद सत्र के दौरान दिल्ली जाऊंगी और वहां कुछ नेताओं से मिलूंगी। उन्होंने कहा कि अगर राष्ट्रपति और  प्रधानमंत्री मिलने का समय देते हैं तो मैं उनसे भी मिलूंगी।

आयोग की रिपोर्ट के चार सबसे अहम बिंदु

1. बंगाल चुनाव बाद हुई हिंसा के मामलों की जांच CBI से कराई जानी चाहिए। मर्डर और रेप जैसे गंभीर अपराधों की जांच होनी चाहिए।

2. बंगाल में बड़े पैमाने पर हुई हिंसा ये दिखाती है कि पीड़ितों की दुर्दशा को लेकर राज्य की सरकार ने भयानक तरीके से उदासीनता दिखाई है।

3. हिंसा के मामलों से जाहिर होता है कि ये सत्ताधारी पार्टी के समर्थन से हुई है। ये उन लोगों से बदला लेने के लिए की गई, जिन्होंने चुनाव के दौरान दूसरी पार्टी को समर्थन देने की जुर्रत की।

4. राज्य सरकार के कुछ अंग और अधिकारी हिंसा की इन घटनाओं में मूक दर्शक बने रहे और कुछ इन हिंसक घटनाओं में खुद शामिल रहे हैं।


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