कूटनीतिक उपलब्धि

अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच रिश्तों को नया आयाम देने के जो संकेत दिए हैं, वे उत्साहवर्धक हैं। पहली और सबसे बड़ी बात तो यही कि अमेरिका ने भारत को अपना महत्त्वपूर्ण सहयोगी माना है। इसे भारत के लिए भी किसी कूटनीतिक उपलब्धि से कम नहीं माना जाना चाहिए। बाइडेन के सत्ता में आने के बाद ब्लिंकन पहली बार भारत आए हैं। वे ऐसे नाजुक वक्त में भारत पहुंचे हैं जब अमेरिका न सिर्फ घरेलू मोर्चों पर बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर भी चुनौतियों का सामना कर रहा है। अमेरिका कोरोना से तो लड़ ही रहा है, साथ ही वह चीन और अफगानिस्तान जैसे संकटों से भी जूझ रहा है। यही मुश्किलें भारत का भी पीछा नहीं छोड़ रही हैं। जाहिर है दोनों देशों के सामने संकट और चुनौतियां एक जैसी हैं। इसलिए दोनों को एक दूसरे का हाथ और साथ चाहिए।

ब्लिंकन की भारत यात्रा का असल मकसद अफगानिस्तान और चीन के मुद्दे पर भारत को अपने साथ खड़ा करना लगता है। फिर चीन से निपटने के लिए अमेरिका जिस रणनीति पर चल रहा है, उसमें भारत की भूमिका मामूली नहीं है। बाइडेन चाहते हैं कि भारत क्वाड समूह को मजबूत बनाने के लिए अमेरिका के साथ खड़ा रहे। क्वाड अमेरिका, जापान, आॅस्ट्रेलिया और भारत का समूह है जो चीन पर नकेल कसने के लिए बनाया गया है। दक्षिण चीन सागर से लेकर हिंद महासागर तक चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों से अमेरिका परेशान है। चीन के इस कदम से भारत की भी नींद तो उड़ी है ही। इसलिए अमेरिका का अब सबसे बड़ा हित भारत और आॅस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ मिल कर चीन की बढ़ती ताकत को रोकना है। पूर्वी लद्दाख में भारत-चीन गतिरोध के संदर्भ में कुछ समय पहले चीन को चेता कर अमेरिका भारत से अपनापन दिखा ही चुका है। अफगानिस्तान के मोर्चे पर भी अमेरिका और भारत चिंतित हैं। अपना बोरिया-बिस्तर समेटने के बाद भी अमेरिका अफगानिस्तान से पिंड नहीं छुड़ा पा रहा है। भारत का संकट यह है कि अगर तालिबान ने सत्ता पर कब्जा कर लिया तो क्या होगा। भारत ने अफगानिस्तान में हजारों करोड़ की विकास परियोजनाएं चला रखी हैं। भारत के लिए एक और बड़ा संकट यह है कि कहीं तालिबान अपने लड़ाकों को कश्मीर में न भेजने लगे। इसलिए ब्लिंकन ने सुरक्षा चुनौतियों पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से भी लंबी चर्चा की।

गौरतलब है कि दो दशकों से अमेरिका और भारत ज्यादा करीब आए हैं। रूस के मुकाबले भारत का झुकाव अमेरिका की ओर बढ़ा है। हालांकि भारत दोनों ही देशों के साथ संतुलन साधते हुए चलता है। पर बदलते वक्त और जरूरतों ने अमेरिका और भारत के बीच दूरियां खत्म कर दी हैं। सैन्य और रक्षा क्षेत्र में बड़े सामरिक समझौतों से लेकर व्यापार के स्तर तक पर भारत और अमेरिका एक दूसरे के पूरक साबित हो रहे हैं। मसलन, महामारी से निपटने में भारत ने अमेरिका को कोरोना टीके भी दिए और वह भी तब जब भारत खुद इनकी कमी झेल रहा था। हालांकि अमेरिका का यह रुख हैरान करने वाला ही रहा कि उसने टीकों के लिए भारत को कच्चा माल देने से यह कहते हुए मना कर दिया था कि पहले वह खुद की जरूरतें देखेगा। लेकिन बाद में अमेरिका भी कोरोना की जंग में भारत के साथ खड़ा होता दिखा। पर इसमें कोई शक नहीं कि अमेरिका और भारत के बढ़ते संबंधों में अमेरिकी हित सर्वोपरि हैं। यही अमेरिका की रणनीति भी है।

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