किसानों को इजाजत नहीं

आंदोलनकारी किसानों को संसद के बाहर धरना-प्रदर्शन करने की इजाजत देने से दिल्ली पुलिस ने मना कर दिया है, जबकि किसान बाईस जुलाई से संसद पर प्रदर्शन का एलान कर चुके हैं। इस मुद्दे पर मंगवार को किसान प्रतिनिधियों और पुलिस के आला अधिकारियों की बैठक भी हुई, पर नतीजा कुछ नहीं निकला। उल्टे पुलिस ने धरने के लिए कोई और जगह तलाशने को कह दिया। इससे टकराव पैदा होने का अंदेशा है। संसद का मानसून सत्र शुरू हो चुका है। दोनों सदनों में किसान आंदोलन का मुद्दा जोरशोर से उठा। इस आंदोलन को आठ महीने से ज्यादा हो गए हैं। किसानों का अब तक जो जज्बा देखने को मिला है, उसे देखते हुए तो लगता है कि किसान संसद के बाहर जाए बिना मानेंगे नहीं। इस बीच दूसरे प्रदेशों से किसानों का दिल्ली की सीमा पर पहुंचना जारी है। ऐसे में किसानों को दिल्ली में घुसने से रोक पाना पुलिस के लिए बड़ा सरदर्द बन गया है। पुलिस का अपने पक्ष में यह तर्क हो सकता है कि प्रदर्शन के नाम पर कहीं वैसी स्थिति खड़ी न हो जाए जैसी इस साल छब्बीस जनवरी को बन गई थी। उस दिन किसान आंदोलन में घुस आए शरारती तत्वों ने लाल किले सहित कई इलाकों में उत्पात मचाया था। जाहिर है, इससे एक जायज किसान आंदोलन की साख को बट्टा लगना ही था। यह सही है कि राजधानी में कानून-व्यवस्था को लेकर पुलिस किसी तरह का जोखिम मोल नहीं ले सकती। पर ऐसा भी नहीं कि आंदोलनकारी किसानों को प्रदर्शन की इजाजत देने के लिए कोई उपयुक्त रास्ता न निकाला जा सके।  संयुक्त किसान मोर्चे ने रोजाना दो सौ किसानों को संसद के बाहर धरना-प्रदर्शन करने देने की इजाजत मांगी है। ये किसान अपने परिचय पत्रों के साथ जत्थे में वहां जाएंगे और अपनी आवाज संसद तक पहुंचाएंगे। लेकिन पुलिस दो सौ किसानों को भी जमा होने देने में बड़ा खतरा देख रही है। उसके इस डर के पीछे शायद वे खुफिया सूचनाएं हैं, जिनमें संसद भवन के आसपास छोटे-छोटे समूहों में किसानों के पहुंचने की खबरें हैं। दरअसल किसानों को दिल्ली में घुसने से रोक पाना व्यावहारिक रूप से संभव भी नहीं है। यह भी एक मुश्किल काम है कि दिल्ली की सीमाओं को संसद सत्र चलने तक बंद कर दिया जाए। ऐसे में घूम-फिर कर सवाल यही आता है कि आखिर किसानों की समस्या का समाधान निकले तो कैसे। अब तक के आंदोलन से साफ हो चुका है कि किसान आसानी से तो नहीं लौटने वाले। दूसरी ओर सरकार भी बार-बार दोहरा रही है कि कुछ भी हो कानून वापस नहीं होंगे। इससे तो तकरार और बढ़ना तय है। किसान आंदोलन में फूट पैदा करने की रणनीति के बजाय वार्ता की कोशिशें ही कोई रास्ता निकाल सकती हैं। यह नहीं माना जाना चाहिए कि मौका हाथ से निकल चुका है। दोनों ही पक्षों को कुछ झुकते हुए बातचीत फिर से शुरू करनी ही होगी। इतिहास गवाह है कि बातचीत से बड़े से बड़े गतिरोध दूर हो जाते हैं, लेकिन किसान आंदोलन के मामले में अब तक देखने में यही आया है कि सरकार का रुख उदारता का नहीं, बल्कि सख्ती का है। उसका रवैया सबक सिखाने वाला है। पर यह नहीं भूलना चाहिए कि फूट डालो और राज करो की नीति से बुनियादी मुद्दों का हल नहीं निकलता। अगर कृषि कानून वाकई किसानों के हित में होते तो क्यों किसान अब तक आंदोलन कर रहे होते!


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