ओलिंपिक से उम्मीदें

टोक्यो और ओलिंपिक का अजीबो-गरीब नाता है। सैंड्रा कॉलिंस की मशहूर किताब- द 1940 तोक्यो गेम्स : द मिसिंग ओलंपिक्स में इसकी एक झलक मिलती है। पुस्तक बताती है कि कैसे जापान के विभिन्न संगठनों ने 1930 में वहां ओलिंपिक कराये जाने की मांग की। कैसे 1936 में अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक संघ ने टोक्यो में आयोजन को हरी झंडी दी। कैसे चीन के साथ युद्ध और विश्वयुद्ध की वजह से टोक्यो खेलों की मेजबानी नहीं कर सका।  कैसे एशिया ने पहली बार ओलिंपिक के आयोजन का मौका गंवा दिया। वर्ष 1964 में आखिरकार जब टोक्यो में ओलिंपिक का आयोजन हुआ, तो 1940 के 'मिसिंग ओलंपिक' को भुला दिया गया। साल 2020 में फिर से कोरोना वायरस महामारी की वजह से टोक्यो ओलिंपिक को स्थागित करना पड़ा। साल 2020 में इसे एक साल के लिए टाल दिया गया। तोक्यो ओलिंपिक अब 2021 में हो रहा है। 'मिसिंग ओलंपिक' भले ही न हो, लेकिन ये 'ओलिंपिक फुल ऑफ सस्पेंस' जरूर है। टोक्यो ओलिंपिक के समारोह से पहले जो भी सस्पेंस हो, लेकिन जापान इसके लिए पूरी तरह से तैयार है। कोरोनाकाल की चुनौतियों के बीच बदलाव का असर यहां भी दिखेगा। जापान के मशहूर आर्किटेक्ट केनगो कुमा ने जब ये स्टेडियम तैयार किया था, तो इसमें 68 हजार लोगों के बैठने की क्षमता थी, लेकिन यहां पैरा-ओलंपिक खेल भी होने थे, तो दिव्यांगों की सुविधा के लिए इसकी क्षमता 58 हजार कर दी गयी। दशकों बाद यह पहला ओलिंपिक होगा, जिसे सिर्फ 10 हजार लोग स्टेडियम में आकर देख सकेंगे। स्टेडियम में आम जनता नहीं होगी, बल्कि राजनयिक, आयोजन समिति से जुड़े सदस्य, अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक समिति के सदस्य और स्पॉन्सर मौजूद होंगे। आम जनता के लिए यह वर्चुअल ओपनिंग समारोह होगा। इटली के मशहूर क्रिएटिव डायरेक्टर मार्क बलीच के निर्देशन में होनेवाला यह समारोह नये सवेरे का संदेश देगा। एक सौ तीस करोड़ की आबादी का देश भारत भी ओलिंपिक स्पोर्ट्स में एक नया सवेरा चाहता है। आबादी में इतना बड़ा देश, लेकिन ओलिंपिक में मेडल के नाम पर शून्य। अमेरिका, रूस, चीन, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे मजबूत देशों के साथ ओलिंपिक में कंधे से कंधा मिला कर खड़े होने में उसे वक्त लगेगा। मिल्खा सिंह ओलिंपिक स्पोर्ट्स की सोच के साथ जुड़े हुए थे।

अगर टोक्यो ओलिंपिक 2020 में तय वक्त पर होता, मिल्खा सिंह भी मौजूद होते, लेकिन यह नहीं हो सका। रोम ओलिंपिक में मिल्खा सिंह का भारत के लिए मेडल जीतने का सपना साकार नहीं हो सका, लेकिन समय के साथ यह भरोसा मजबूत होता गया कि एक दिन हम ओलिंपिक में भी बेहतर करेंगे। कभी पीटी ऊषा मंजिल के करीब पहुंचने में कामयाब हुईं, तो कर्णम मल्लेश्वरी, लिएंडर पेस और कर्नल राज्यवर्धन राठौर मंजिल पार भी कर गये।

ओलिंपिक स्तर पर कोई देश तभी आगे बढ़ सकता है, जब पूरी व्यवस्था मिल कर खिलाड़ियों की पौध तैयार करे। मिल्खा सिंह खेलों में ऐसे भारत को देखना चाहते थे। लंदन ओलंपिक 2012 पदक के मामले में भारत के लिए सबसे कामयाब रहा है। भारत ने इसमें छह पदक जीते, लेकिन चार साल बाद रियो ओलिंपिक्स में दो मेडल मिले। सरकार ने एक टास्क फोर्स का गठन कर पहली बार स्वीकार किया है कि ओलिंपिक में अपेक्षित कामयाबी के लिए एक दीर्घकालिक सोच की जरूरत है।

इसके लिए व्यवस्था में मूलभूत बदलाव करना होगा। टास्क फोर्स ने अगले तीन ओलिंपिक की तैयारियों के लिए सुझाव के साथ एक मसौदा भी तैयार किया। नीति आयोग ने भी एक रोड मैप तैयार किया। खेलो इंडिया गेम्स के जरिये टैलेंट बेस में व्यापक विस्तार की तैयारी की गयी। टारगेट ओलिंपिक पोडियम स्कीम के तहत उच्च स्तर के खिलाड़ियों को हर संभव सुविधा और उनसे लगातार संपर्क की ईमानदार कोशिश की गयी। टोक्यो ओलिंपिक में भारत को कितने मेडल मिलेंगे, इसके बारे में स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के अधिकारी, मौजूदा और पूर्व खिलाड़ियों और खेल के जानकारों की राय जानने की कोशिश की। अधिकतर लोगों का मानना है कि भारत या तो लंदन ओलिंपिक-2012 के बराबर पदक लाने में कामयाब होगा या फिर इससे आगे जायेगा। कर्नल राज्यवर्धन राठौर ने जब एथेंस ओलंपिक 2004 में मेडल जीता, उसके बाद से निशानेबाजों ने हर ओलिंपिक में मेडल जीतना शुरू कर दिया। साल 2008 बीजिंग ओलिंपिक में अभिनव बिंद्रा व्यक्तिगत तौर पर गोल्ड मैडल जीतनेवाले पहले भारतीय बने। लंदन ओलिंपिक में भारत की ओर से गगन नारंग और विजय कुमार ने मेडल जीता। टोक्यो ओलिंपिक में भारत की ओर से निशानेबाजों की एक नयी पौध तैयार है। सौरव चौधरी और मनु भाकर की अगुआई में ये पौध अपने झंडे गाड़ने के लिए तैयार है। कुश्ती में भारत को बजरंग पुनिया और विनेश फोगाट से मेडल की उम्मीद है।


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