कब थमेगा गुटवाद

कोंग्रेस आलाकमान लाख कोशिश कर रहा है, लेकिन पार्टी में शुरू तू बड़ा कि मैं बड़ा का खेल थमने का नाम ही नहीं ले रहा है. यह कहीं ना कहीं आलाकमान की ही विफलता दर्शाता है. उन्हें अनुमान ही नहीं लग पा रहा है  कि कैसे कदम उठाये कि ि‍स्थति नियंत्रण में हो. पंजाब और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों के विधानसभा चुनाव सन्निकट हैं, लेकिन पार्टी अभी भी इन राज्यों में अपने घर को दुरुस्त नहीं कर पाई है, उसमें वांछित एकसुरता का सर्वथा अभाव दिख रहा है. यही हाल राजस्थान और छत्‍तीसगढ़ का भी है महाराष्ट्र में भी अकेला चलना है या महाविकास अाघाड़ी का हिस्‍सा बनकर आगे चलना है, को लेकर पार्टी में दो फाड़ साफ़ दिख रहा है. हर जगह जिस तरह गुट उभरकर सामने आ रहे हैं, बयानबाजी हो रही है उससे साफ है कि पार्टी आलाकमान की रिट आज वैसी नहीं चल रही है जैसे अतीत में चलती थी और जब तक यह नहीं होगा तब तक पार्टी में गुटवाद पर लगाम लगेगी ऐसा नहीं लगता. पंजाब में जिस तरह हास्य और राहत मिश्रित ड्रामा चल रहा है एक ही दिन में जिस तरह सुलटने और उलझने का खेल हो रहा है वह चुनाव के समय पार्टी का बंटाधार कर सकता है. पार्टी नीति नियंताओं को इसका एहसास भी नहीं हो रहा है. वहां का नाटक पार्टी कार्यकर्ताओं के भ्रम को और बढ़ा रहा है. कारण उन्हें ऐसा लग रहा है कि आलाकमान और उसके नुमाइंदे  पार्टी के नेताओं के अहम के टकराव को रोक कर उनमें उस एकजुटता का संचार नहीं कर पा रहे हैं जिसकी चुनाव की बेला पर जरूरत है. कहीं ऐसा तो नहीं कि अालाकमान समस्या को ही नहीं समझ पा रहा है और इलाज करने का प्रयास कर रहा है. कारण जिस तरह अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में पंजाब में सरकार चल रही है जिस तरह पार्टी के खिलाफ विपरीत प्रवाह के बावजूद और पंजाब में आप और अकालीदल द्वारा कठिन चुनौती देने का प्रयास करने के बावजूद राज्य में पार्टी की हालत सही रखी है, एक ऐसे नेता के लिए जो अपने बड़बोलेपन  और उच्छृंखल व्यवहार के लिए जाना जाता है और जिसका नेतृत्व अभी आजमाया जाना बाकी है के लिये अमरिंदर को परेशान किया जाना समझ से परे है। अब तो यह भी लगने लगा है कि अमरिंदर सिंह को झकझोरने के चक्कर में कहीं राज्य में कांग्रेस ही ना भूसपाट हो जाए. कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने डरपोक कांग्रेस छोड़ सकते हैं का नारा दिया। क्या पार्टी को जिस दलदल में आज पार्टी है उसे उबारने का यह सही तरीका है? हर व्यक्ति जो पार्टी उबारने की बात करता है या अालाकमान से ऐसा कुछ करने को कहता है कि पार्टी में व्याप्त मरगल दूर हो उसे डरपोक की संज्ञा देना सही नहीं है. कुछ लोग भले ही सत्‍ता की लालच में पार्टी का त्याग किये हो, लेकिन राहुल गांधी को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि राजनीति में बिरला ही तपस्या करने या जनकल्याण के लिए अपना जीवन न्योछावर करने के लिए आता है। उसका अंतिम लक्ष्य सत्ता सुन्दरी का उपभोग करना होता है, जो पूरा करती कांग्रेस आज उन्हें नहीं दिख रही है.

जो पार्टी में भगदड़, गुटवाद आदि तमाम बीमारियों का कारण  है. तो आलाकमान को अब उन कमियों का पता लगाने की ओर अपना ध्यान केंद्रित करना होगा जो उसके निरंतर जन समर्थन के क्षरण का कारण है. जब तक पार्टी जनता का समर्थन पाते नहीं दिखेगी जहां कहीं थोड़ा बहुत समर्थन है वहां जूतम-पैजार स्वाभाविक है उसका इलाज पुराने तौर तरीकों से नहीं होगा. कांग्रेस की हालत आज उन पुराने रजवाड़ों जैसी है, जिनकी रियासत जा चुकी है, लेकिन ऐंठन अभी भी राजशाही वाली बरकरार है, जो उन्हें उनकी गाड़ी कितनी नीचे धंसी है इसका एहसास ही नहीं होने दे रहा है और ना ही उन्हें कुछ नया सोचने दे रहा है. कांग्रेस आलाकमान का ध्यान अब इस ऐंठन को दूर करने और उन कारणों को चिन्हित करने की ओर लगाना होगा, जिसके चलते उसकी आज की दुरावस्था हुई है। उनका चिन्ही करण और यथोचित इलाज ही उसे एक बार फिर प्रासंगिक बनाएगा और उसकी रिट चलाएगा, नहीं तो जो जूतम-पैजार के दृश्य दिखाई दे रहे हैं वे और बढ़ने वाले हैं, गुटवाद थमेगा नहीं और बढ़ेगा। 


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