कमीशन का नशा

जब कोई व्यक्ति बीमार होता है, भगवान के बाद उसे केवल डॉक्टर याद आता है। डॉक्टर पर्ची पर जो दवा लिख दे, मरीज और उसके परिजन उसे ही ‘संजीवनी’ मानते हैं। पर्ची लेकर दौड़ते हैं, यहां से वहां। कोई दवा कहीं मिलती है, कोई कहीं। ठीक होने के बाद लाखों दुआएं भी देते हैं। मगर इससे इतर एक सच यह भी है कि डॉक्टर मरीज को शारीरिक रूप से तो तंदुरुस्त कर देते हैं लेकिन आर्थिक सेहत बुरी तरह बिगाड़ने के बाद। बीमारी से तो वह कुछ दिन में उबर जाता है लेकिन आर्थिक झटके से उबरने में उसे महीनों लग जाते हैं। यह स्थिति भी तब है, जब सरकारी अस्पतालों में ज्यादातर बीमारियों का इलाज निःशुल्क है। दवाएं भी अस्पतालों से ही देने का प्रावधान है। दरअसल, सरकारी अस्पतालों के ज्यादातर डॉक्टर मरीजों को जेनेरिक की बजाय ब्रांडेड दवाएं लिखते हैं, ताकि कमीशन मिलता रहे। मरीज, परिजन और उनकी आर्थिक स्थिति का जो हो सो हो, बस अपनी जेब भरती रहे। सस्ती जेनेरिक दवाएं अस्पतालों के लाइफ लाइन स्टोर और बाजार में उपलब्ध हैं, लेकिन ज्यादातर डॉक्टरों की कलम से ब्रांडेड दवाओं के नाम ही पर्ची पर उतरते हैं। क्या यह खेल सिर्फ दुकानदार और डॉक्टर चला रहे हैं? रोजाना सैकड़ों अस्पतालों में हजारों डॉक्टर लाखों मरीजों को ब्रांडेड दवाएं लिखते हैं। सोचिए... कारोबार कितना बड़ा होगा! लाखों मरीजों को पल-पल लूटा जाए और शासन-प्रशासन में बैठे जिम्मेदार लोगों को भनक भी न हो, क्या यह संभव है? शासन-प्रशासन में बैठे जिम्मेदारों की मिलीभगत, लापरवाही या अनदेखी के बिना क्या यह सिलसिला अंतहीन चल सकता है?

आज किसी भी सरकारी अस्पताल पर नजर डालें, परिसर में और आसपास अनेक बिचौलिए (लपके) मरीजों की पर्चियों पर गिद्ध दृष्टि डालते दिख जाएंगे। क्या जिम्मेदारों की मौन स्वीकृति के बिना ये लपके अस्पतालों में मरीजों के परिजन से जोर-जबरदस्ती कर सकते हैं? इधर सरकार वादों-इरादों और नीतियों में जेनेरिक दवाओं पर जोर दे और उधर ब्रांडेड दवाएं बनाने वाली कंपनियां साल-दर-साल फलती-फूलती जाएं, क्या यह संभव है? क्या इन ‘फल’ और ‘फूल’ की ‘खुशबू’ जिम्मेदारों तक नहीं पहुंचती?

 जब-जब मसला उठता है, सरकार और उसके आला अफसर कागजी निर्देश जारी कर इतिश्री कर लेते हैं। पालना पूरी तरह हो रही है या नहीं, यह देखने वाला कोई नहीं है। मरीज लुटते रहते हैं कमीशन खोरी बढ़ती जाती है। सरकार को चाहिए कि खानापूर्ति के आदेशों से उबरे। पुख्ता कार्रवाई करे। अस्पतालों में इलाज की प्रक्रिया की निगरानी का ठोस प्रबंध करे। उसकी नियमित समीक्षा भी हो। सरकार ऐसा कोई अलग मंच भी उपलब्ध कराए, जहां मरीज और उनके परिजन इस मसले से जुड़ी पीड़ा बता सकें। उनके त्वरित निदान की व्यवस्था हो। निर्देश के बावजूद जेनेरिक दवाएं लिख रहे डॉक्टरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई अमल में लाई जाए। सरकार को इस मसले पर गंभीरता से विचार करना होगा। यह कतई बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए की मरीज की ‘सेहत ठीक’ करके उसे ‘आर्थिक बीमार’ कर दिया जाए। ऐसे डॉक्टरों, बिचौलियों, लालची दुकानदारों और लापरवाह अफसरों को चिन्हित करके ‘ठीक’ करना चाहिए।


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