अब बच्चों की बारी

बच्चों के लिए कोरोना टीके जायकोव-डी को मंजूरी मिलना टीकाकरण की दिशा में किसी बड़े कदम से कम नहीं है। अभी तक टीके अठारह साल से ऊपर वालों को ही लगाए जा रहे हैं। इससे कम उम्र वालों के लिए टीका नहीं था। विशेषज्ञ लगातार चेतावनी देते रहे हैं कि तीसरी लहर बच्चों के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। इसलिए भी बच्चों का टीकाकरण जरूरी हो गया था। देश में बारह से अठारह साल के बीच की आबादी छब्बीस करोड़ के आसपास है, जो कुल आबादी के पांचवें हिस्से से थोड़ी ही कम है। इसलिए अगर समय रहते बच्चों का टीकाकरण नहीं किया गया तो खतरा सामने खड़ा रहेगा। बच्चों को टीके इसलिए भी जरूरी हैं, क्योंकि अब ज्यादातर राज्यों में स्कूल-कालेज खुल रहे हैं। जब बच्चे बाहर घरों से बाहर निकलेंगे, तो जाहिर है भीड़ से बचाव संभव नहीं होगा और संक्रमण का खतरा बढ़ेगा। इसलिए जितनी जल्दी अठारह से कम उम्र वालों का टीकाकरण होगा, महामारी का जोखिम उतना ही कम किया जा सकेगा।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि बच्चों के लिए बने जिस टीके को आपात इस्तेमाल की मंजूरी मिली है, वह स्वदेशी है। तीन खुराक वाले इस टीके की खूबी यह बताई जा रही है कि यह दुनिया का पहला टीका है जो डीएनए आधारित है। जबकि अभी तक दुनियाभर में जितने भी टीके आए हैं, वे आरएनए पर आधारित हैं। अब तक अट्ठाईस हजार से ज्यादा लोगों पर इसके तीसरे चरण का परीक्षण हो चुका है। दावा किया जा रहा है कि यह टीका छियासठ फीसद कामयाब है। यह टीका सूई के जरिए नहीं दिया जाएगा। बहुत से लोगों के मन में सूई को लेकर एक प्रकार का भय बना रहता है और इस डर के मारे वे टीकाकरण से बचते देखे गए हैं। खासतौर से बच्चों के साथ यह समस्या ज्यादा ही है। जायकोव-डी टीका बांह पर चिपका दिया जाता है और तीन दिन में त्वचा के जरिए शरीर में पहुंच जाता है। अगर यह पूरी तौर पर कारगर रहा तो फिर बारह साल से छोटे बच्चों के लिए भी बिना सूई की यह तकनीक सुविधाजनक साबित हो सकती है। अभी शिशुओं से लेकर बारह साल तक के बच्चों को भी कोरोना से बचाना कम बड़ी चुनौती नहीं है। हाल में कनाडा में एक शोध से इस बात की पुष्टि हुई है कि अगर तीन साल से छोटे बच्चे कोरोना संक्रमित हो जाते हैं तो घर के दूसरे बड़े सदस्यों के लिए जोखिम पैदा हो जाता है। इसलिए दुनिया को अब छोटे बच्चों के टीके का भी इंतजार है। पर टीका आ जाना ही काफी नहीं है। चुनौतियां और भी हैं। भारत में टीकों के उत्पादन की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। टीका उत्पादक कंपनियां जरूरत के हिसाब से उत्पादन कर नहीं पा रही हैं। जाहिर है, उनकी अपनी सीमाएं और मजबूरियां हैं। टीकों की खरीद नीति भी अड़चन भरी साबित हुई है। इससे टीकाकरण अभियान बाधित हुआ है। देश की एक तिहाई आबादी को ही कोरोना टीके की पहली खुराक लग पाई है। दो खुराक लेने वालों का आंकड़ा बहुत ही कम है। पहली खुराक के बाद दूसरी खुराक के लिए लोगों को लंबा इंतजार करना पड़ा है। हालांकि बच्चों का टीका बनाने वाली कंपनी जायडस कैडिला ने दस से बारह करोड़ टीके सालाना उत्पादन की बात कही है। ऐसे में छब्बीस करोड़ बच्चों का जल्द टीकाकरण करना इतना आसान नजर नहीं आता। अब तक के अनुभवों से सबक लेते हुए ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए, जिसमें बच्चों के टीकाकरण में वैसा व्यवधान न आए जिससे हम अब तक दो चार हो रहे हैं।


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