मोदी का दौरा

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी अमेरिका यात्रा पर बुधवार को रवाना हो गए। जब से कोरोना वायरस फैला है उसके बाद से यह प्रधानमंत्री की दूसरी विदेश यात्रा है। इसी साल मार्च महीने के आखिरी सप्ताह में नरेंद्र मोदी बांग्लादेश की आजादी की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर दो दिनों के लिए वहां गए थे। भारतीय प्रधानमंत्री की यह यात्रा कई कारणों से बहुत महत्वपूर्ण है। वॉशिंगटन अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन से नरेंद्र मोदी आमने सामने पहली बार मिलेंगे। दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय और बहुपक्षीय मंचों पर कई बार विचारों का आदान प्रदान होगा। अपनी अमेरिका यात्रा के अंतिम दिन, 25 सितंबर को नरेंद्र मोदी राष्ट्रसंघ आम सभा में अपना भाषण देंगे।

23 सितंबर को प्रधानमंत्री जापान के प्रधानमंत्री योशीहिदे सुगा और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन से One-On-One मुलाक़ात करेंगे। 24 तारीख को QUAD ग्रुप के पहले शिखर सम्मलेन में चारों देशों- अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के सरकार प्रमुख सशरीर एक साथ होंगे, लेकिन इसके पहले राष्ट्रपति बाइडेन और प्रधानमंत्री मोदी की द्विपक्षीय मुलाकात होगी। अमेरिका यात्रा पर रवाना होने से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इस यात्रा में वे राष्ट्रपति बाइडेन के साथ भारत-अमेरिका संबंधों को रिव्यू करेंगे, यानि दोनों देशों के रिश्तों में पिछले दो साल में कितनी प्रगति हुई है, इसका मूल्यांकन होगा। मोदी और बाइडेन अफगानिस्तान, जलवायु परिवर्तन, कोरोना वायरस वैक्सीन की सप्लाई और उच्च टेक्नोलॉजी के ट्रांसफर जैसे विषयों पर बात करेंगे।

अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी के बाद वहां मौजूद परिस्थितियों पर होने वाला विचार महत्वपूर्ण है, क्योंकि चारों QUAD देशों में से इस बदलाव से भारत सबसे ज़्यादा प्रभावित हुआ है, वहां पर छोड़े गए अमेरिकी सैनिक साजोसामान का भी सबसे बुरा असर भारत पर पड़ने की आशंका है। प्रधानमंत्री मोदी यह मुद्दा राष्ट्रपति बाइडेन के सामने जरूर उठाएंगे। इसके साथ-साथ अफगानिस्तान में अमेरिका की गैर मौजूदगी से पैदा हुए शून्य को भी चीन और उसके हुक्मबरदार पाकिस्तान ने तेजी से भरने की कोशिश की है। इससे भी दक्षिण एशिया में भारत के राष्ट्रीय हित प्रभावित हो रहे हैं। वास्तव में चीन, भारत और अमेरिका दोनों के लिए एक बड़ा मुद्दा बन गया है। भारत के लिए चीन सुरक्षा, सीमा निर्धारण, कूटनीति और अर्थव्यवस्था के विकास, इन सभी प्रश्नों पर एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। अमेरिका के लिए भी चीन इसलिए बड़ी चुनौती है, क्योंकि वह अमेरिका को सुपरपावर के तख्त से धकेल कर वहां खुद बैठना चाहता है। यही वजह है कि अमेरिका का पूरा ध्यान अभी इंडो पैसिफिक पर है जो भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के प्रभाव क्षेत्र में आता है। दुनिया के तेल और अन्य चीज़ों के व्यापार का लगभग 50 प्रतिशत मलक्का स्ट्रेट से हो कर गुज़रता है जो पैसिफिक यानि प्रशांत महासागर को हिन्द महासागर से जोड़ता है। यही वजह है कि अमेरिका, यूरोप, चीन, भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और ज्यादातर दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों के लिए इंडो पैसिफिक इलाका बहुत महत्व रखता है।  जाहिर है QUAD ग्रुप का शिखर सम्मेलन प्रधानमंत्री मोदी की इस अमेरिका यात्रा का एक ऐसा कार्यक्रम है जिस पर चीन समेत पूरी दुनिया की नजरें रहेंगी। हालांकि QUAD देशों के बीच सामरिक सहयोग को बड़ी पैनी नजर से देखा जाता है, लेकिन QUAD देशों में सहयोग के और भी जरूरी आयाम हैं। इनमें कोरोना वायरस को कंट्रोल करने के लिए गरीब देशों के लिए जरूरी वैक्सीन उपलब्ध कराना, कोरोना वायरस का पक्का इलाज खोजने के लिए रिसर्च करना और जलवायु परिवर्तन को दुरुस्त करने के लिए कदम उठाना शामिल है। आमने -सामने बैठ बातचीत कर QUAD नेता ये साबित करेंगे कि उनकी जिम्मेदारी इंडो पैसिफिक में केवल नौवहन को मुक्त और सुरक्षित रखना ही नहीं है, बल्कि वे इस इलाके के देशों में स्वस्थ जीवन और स्वच्छ जलवायु और पर्यावरण सुनिश्चित करने के लिए काम करेंगे और सबसे बड़ी बात- ये चारों देश जनतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास करते हैं, तानाशाही में नहीं।

वॉशिंगटन में भारत लगभग हफ्ते भर पहले घोषित अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया की नौसैनिक संधि AUKUS के बारे में भी जानना चाहेगा कि कहीं यह QUAD के महत्व को काम तो नहीं कर देगा। भारत इस सम्बन्ध में अमेरिका से साफ वादा चाहेगा कि QUAD के प्रति अमेरिका की निष्ठा 100 फीसद रहे। 25 सितंबर को भारतीय समय के हिसाब से शाम लगभग 6.30 बजे प्रधानमंत्री मोदी संयुक्त राष्ट्र संघ आम सभा को संबोधित करेंगे। उम्मीद है उनका भाषण ग्लोबल आतंकवाद और दुनिया में धर्म के आधार पर लगातार बढ़ते कट्टरपंथ को रेखांकित करेगा। नरेंद्र मोदी कह सकते हैं कि भारत लम्बे समय से आतंकवाद का शिकार रहा है और इसकी लगातार बढ़ती प्रवृति को रोकना दुनिया के सभी देशों की जिम्मेदारी है। भारतीय प्रधानमंत्री दुनिया में धार्मिक कट्टरवाद की वजह से बढ़ती हिंसा को रोकने के लिए भी राष्ट्रसंघ के सदस्य देशों से आग्रह करेंगे ऐसी उम्मीद है। 

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