बोगेनवेलिया जितना सुंदर, उतना ही गुणकारी

 

जैसा नाम वैसा बहार, इसे कागज़ का फूल भी कहा जाता है। बहुत ही कम देखभाल मे बग़ीचे को सुंदर और रंगीन बनाने में यह पौधा उत्तम है। अलग अलग देशों में इससे अलग अलग नामों से जाना जाता है। मूलरूप से यह पौधा दक्षिण अमेरिका के देशों में पाया जाता है। आम तौर पर वहां के लोग इसे बग़ीचे मे एवं वह अपने घर के मुख्य द्वार पर लगाते हैं। इसकी खोज फिलबरट कॉमर्रसन और लुई एंटोनी डी बोगनविले नाम के दो वैज्ञानिकों ने किया था। इनमें से एक वैज्ञानिक के नाम पर इस पौधे का नाम रखा गया।

बोगेनवेलिया और इस पौधे को जन समक्ष प्रस्तुत किया गया 1789 में। यह एक लता प्रजाति का पौधा है। पूरी दुनिया ने इस पौधे की 20 प्रजाति पाई जाती है जिसे लगभग 300 से ज्यादा क़िस्म के पौधे देखने को मिलते हैं। यह किसी भी प्रकार के मिट्टी और जलवायु में ज़िंदा रहते हैं। इनमें ज्यादातर प्रजातियों के पौधे मैं नुकीले काँटे होते हैं। इसमें करीब बारहों महीने फूल होते है। ये सभी एक साथ खिलते हैं, फूलों के साथ-साथ पूरा पौधा भी हरा भरा हो जाता है। बोगेनवेलिया के फूल देखने में ही सुन्दर नहीं हैं बल्कि इसके बहुत सारे एलोपैथिक एवं आयुर्वेदिक इलाज सामने आए हैं। यह पौधा आयुर्वेद मे खांसी, दमा, पेचिश, पेट या फेफड़ों के तकलीफ जैसी समस्याओं मे उपयोग में लाया जाता है।

आईआईटी कानपुर के विशेषज्ञो ने बोगेनवेलिया के फूल से ऐसी कृत्रिम त्वचा तैयार की, जिससे गहरे घाव भरने और खराब हो चुकी त्वचा को जल्दी ठीक करने मे इस्तेमाल किया जा सकेगा। इसकी खासियत यह है सामान्यत: जितने समय में चोट ठीक होती है या जख्म भर जाता है उससे आधे समय मे ये हीलिंग हो जाएगी। इस शोध को पेटेंट करा लिया गया है। इस रिसर्च के फॉर्मूले को एक निजी कंपनी को दिया जाएगा जहां कृत्रिम त्वचा तैयार की जाएगी। सूत्रों के मुताबिक इस साल के अंत तक कृत्रिम त्वचा तैयार करने का काम शुरू हो जाएगा।


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