टीकाकरण की रफ्तार

 बीते कुछ दिनों से टीकाकरण अभियान में जो तेजी आयी है, वह बेहद जरूरी है, क्योंकि कोरोना महामारी की तीसरी लहर कभी भी दस्तक दे सकती है, अगर व्यापक स्तर पर टीके नहीं लगाये जायेंगे, तो तीसरी लहर की स्थिति में अधिक आयु के लोगों के लिए जोखिम बढ़ जायेगा। यदि एक खुराक भी ली जायेगी, तो बहुत हद तक गंभीर बीमारी और मौत के खतरे को टाला जा सकता है। अब भी देश में ऐसे राज्य हैं, जहां आबादी में बुजुर्ग लोगों का अनुपात अधिक है, पर टीकाकरण उस अनुपात में नहीं हो सका है। टीकाकरण का मुख्य उद्देश्य संभावित मौतों को रोकना है। ऐसे में वैक्सीन कवरेज बढ़ाने के साथ हमारी प्राथमिकता अधिक आयु वर्ग में अधिकाधिक टीकाकरण होना चाहिए। जहां तक इस अभियान में टीकों की आपूर्ति का मामला है, तो यह अब भी मुख्य रूप से कोविशील्ड पर निर्भर है, विभिन्न कारणों से पहले कोवैक्सीन की आपूर्ति योजना के अनुरूप नहीं हो सकी थी, पर अब धीरे-धीरे उसमें भी सुधार हो रहा है। कुछ अन्य टीकों के इस्तेमाल की मंजूरी भी दी गयी है। ऐसे में आपूर्ति की समस्या पहले जैसी नहीं रहेगी और अभियान में लगातार तेजी आती जायेगी। इसके संकेत हमें रोजाना के आंकड़ों में दिखने लगे हैं।

 इस संबंध में हमें एक और पहलू की ओर ध्यान देना चाहिए, जब योग्य आबादी के 60-70 फीसदी हिस्से को खुराक दी जा चुकी होगी, तो बचे हुए लोगों को टीका लेने के लिए तैयार करने में मेहनत लगेगी. अफसोस की बात है कि ऐसे बहुत से लोग हैं, जो यह समझते हैं कि उन्हें वैक्सीन की जरूरत नहीं है या उन्हें लगता है कि वैक्सीन के कथित दुष्प्रभाव कोरोना संक्रमण से भी खतरनाक हैं। अभियान के पहले चरण में हम आपूर्ति से संबंधित समस्याओं का सामना कर रहे थे, जिस कारण टीकाकरण की रफ्तार धीमी थी। अब आगे हमें मांग की बाधाओं का सामना करना होगा। यदि हम आंकड़ों को देखें, तो 60 साल उम्र से अधिक की आबादी के प्रति हजार लोगों में 947 खुराक दी जा चुकी है।

इनमें से 62 फीसदी को एक खुराक तथा 32 फीसदी आबादी को दोनों खुराक मिल चुकी है, अगर तीसरी लहर आती है, ऐसे लोगों में गंभीर संक्रमण होने या उनके मरने की संभावना बहुत ही कम है। इनके संक्रमित होने की संभावना भी बेहद कम है। देश में 45 से 60 साल आयु की भी 62 प्रतिशत तक टीके पहुंच चुके हैं तथा 18 से 45 साल उम्र के 40 फीसदी लोग खुराक ले चुके हैं। हालांकि 18 से 45 साल के वर्ग में केवल चार प्रतिशत लोगों को ही दोनों खुराक मिली है, पर इस वर्ग को उतना जोखिम नहीं है, जितना अधिक उम्रवालों को है। उल्लेखनीय है कि 45 से 60 साल आयु वर्ग के 25 फीसदी लोगों को टीके की दोनों खुराक मिल चुकी है। हमें अब इस पर ध्यान केंद्रित करना होगा कि 45 साल से अधिक आयु के जिन लोगों में जागरूकता की कमी या गलत सूचनाओं के कारण टीका लगाने में हिचक है, उन्हें कैसे इस अभियान से जोड़ा जाये।

ऐसे लोगों के महामारी से पीड़ित होने की आशंका सबसे अधिक है। सो, अब भी आपूर्ति की समस्या है, पर वह धीरे-धीरे दूर हो रही है, लेकिन हम अब ऐसे मोड़ की ओर बढ़ रहे हैं, जहां मांग को बढ़ाने की जरूरत होगी यानी बची हुई आबादी को टीका लेने के लिए तैयार करना होगा, जिन्हें टीका लेना है, उन्हें जल्दी ही खुराक मुहैया हो जायेगी, पर उनके बारे में भी सोचना होगा, जो टीका नहीं लेना चाहते हैं। अधिक आयु के जो लगभग 38 प्रतिशत लोग टीकाकरण कवरेज से बाहर हैं, वे कुछ राज्यों में अधिक संख्या में हैं, मसलन तमिलनाडु जैसे राज्य में वहां टीकाकरण कम है और अधिक आयु के लोगों का अनुपात ज्यादा है। ऐसे राज्यों में अगर छोटी लहर भी आती है, तो उससे बहुत नुकसान हो सकता है।  

उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में कम टीकाकरण होने पर चर्चा अधिक हो रही है, पर हमें यह समझना होगा कि ऐसे कुछ राज्यों में आबादी का आधा से अधिक हिस्सा अपेक्षाकृत युवा है और महामारी से उसके गंभीर रूप से संक्रमित होने या मरने की आशंका कम है। इन राज्यों में भले ही संक्रमितों की संख्या अधिक हो जाए, पर जान का नुकसान कम होगा।  टीकाकरण की कुछ उपलब्धियां बहुत अहम हैं, अब तक 85 फीसदी स्वास्थ्यकर्मियों को दोनों खुराक और शेष को एक खुराक मिल चुकी है। फ्रंटलाइन कर्मियों में 93 प्रतिशत को टीका दिया जा चुका है, जिनमें 65 प्रतिशत को दोनों खुराक मिल चुकी है। हम विकसित देशों से बेमतलब तुलना करते हैं। यदि समकक्ष देशों को देखें, तो उनकी तुलना में भारत का टीकाकरण अभियान बहुत आगे है। समस्याओं और गड़बड़ियों के बावजूद ऐसा कर पाना संतोषजनक है। टीका उत्पादन की क्षमता पहले से ही होने की वजह से ऐसा हो सका है। जब हम लहर की बात करें, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि वह मौत की लहर न बने। संक्रमण तो होता रहेगा, पर वह जानलेवा न बने, इसके लिए टीकाकरण का विस्तार जरूरी है। कोरोना भी अन्य बीमारियों की तरह अभी हमारे बीच रहेगा। 

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