पहले कांग्रेस को प्रासंगिक बनाने की जरूरत

कंग्रेस पार्टी आज अपने अब तक के अस्तित्व की सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रही है. समय- समय पर जी-23 नेता अपने आक्रोश के तीर छोड़ ही रहे हैं, लेकिन जिस तरह पार्टी नेतृत्व ने पंजाब में सरकार  के और संगठन में फेरबदल को अंजाम दिया और जिस तरह की परिणित सामने आई कि नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष जिनके बारे में यह कहा जा रहा है कि उन्हीं के चलते सत्ता और संगठन में इतना बड़ा परिवर्तन किया गया, खुद अपने पद से इस्तीफा दे दिया. पूरे देश के कांग्रेस जनों को उद्वेलित कर रहा है. चारो ओर से परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से यह सवाल पूंछे जा रहे हैं कि क्या चुनाव की आखिरी बेला में पंजाब में जो कुछ किए जाने की संस्तुति कांग्रेस आलाकमान ने दी क्या यह सही और जरूरी थी? क्या अमरिंदर सिंह जैसे वरिष्ठ, अनुभवी और वफादार व्यक्ति को इस तरह दरकिनार किया जाना चाहिए था, कि अपने आप को अपमानित महसूस करें और बगावत पर उतरने को बाध्य हों और वह भी सिद्धू जैसे अस्थिर व्यक्ति के लिए, जो अपनी चलाने के लिए जाने जाते हैं और नहीं तो नाव डुबाने से भी परहेज नहीं करते. इसने बैठे बिठाए एक बार फिर कांग्रेस की जी-23 को सक्रिय कर दिया है. साथ ही पार्टी जिस दलदल में है, उससे उबारने की आलाकमान और उनकी सलाहकार टीम की क्षमताओं पर भी प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया है. आज कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर से लेकर नीचे तक कई धड़ों में बंटी दिखाई दे रही है. शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता है, जब कोई ना कोई नेता देश के किसी ना किसी कोने से पार्टी का दामन छोड़ कर दूसरी पार्टी का दामन ना पकड़ रहा हो. इसके पूर्व मध्य प्रदेश में सरकार पार्टी के गुटवाद की बलि चढ़ गयी और कई नेता पार्टी को टाटा कह कर आज भाजपा में मंत्री बनाए गये. आलाकमान तमाशबीन ही बना रहा. अभी राजस्थान और छत्तीसगढ़ में ि‍स्थति पार्टी की दृष्टि से चिंताजनक है. केरल में घमासान है. कई राज्यों में जहां अभी हाल के वर्षों में पार्टी की ि‍स्थति मजबूत थी, आज वहां कोमा में है. उसके लिए कुछ किया जा रहा है, ऐसा नहीं लगता और जहां कुछ किया जा रहा है, वहां पंजाब, केरल जैसे परिणाम आ रहे हैं. संकेत साफ है कि कुछ निर्णय लेने के पहले जिस तरह के होम वर्क करने की जरूरत है, जिस तरह की दूरदर्शिता दिखनी चाहिए उसका सर्वथा अभाव नजर आ रहा है. इसलिए बदलाव के फैसले के बाद ि‍स्थति और विद्रूप रूप में समाने आ रही है और पार्टी के दुरावस्था में सुधार के आशाओं पर ही तुषारापात कर कार्यकर्ताओं में भ्रम और हताशा का संचार कर रही है. इससे जो समझ में आता है वह यह है कि कांग्रेस की समस्या देशव्यापी है. भाजपा सरकार के सफलता ने उसमें विचारधारात्मक उहापोह पैदा कर दिया है. पार्टी उस पर विचार नहीं कर रही है अभी भी अपनी पुरानी रीति-नीति पर ही अडिग है और उसी तरह चलना चाहती है. जैसे वह अपने स्वर्ण काल में चलती थी, जबकि आज वह अपनी दुरावस्था के चरम पर है, तो उसे अपनी रीति-नीति, बदलाव के तौर-तरीके, मूल्यांकन के मापदंड सब बदलने होंगे और यह तब होगा जब इस बार गंभीर मनन-चिंतन होगा और ऐसा कर किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाएगा. अभी प्रश्‍न यह है कि कांग्रेस ने अपना जनाधार क्यों खोया? कारण जब यह समझ में आयेगा तभी तो उन गलतियों को दूर करने के लिए कुछ कदम उठ सकता है. कांग्रेस इसके पहले भी सत्ताच्‍युत हुई है, लेकिन उस समय के सत्ताधारियों के कमियों से भले ही बैशाखियों के बलबूते वह पुनः सत्ता में वापस होती रही है, लेकिन आज मोदी नीत जिस भाजपा से उसका मुकाबला है वह अपने तौर-तरीकों से कांग्रेस को कालबाह्य कर चुकी है, अब कांग्रेस को चुनौती अपने आपको पुनः देश की जनता के सामने प्रासंगिक और उपयोगी बनाने की है. जब वैसा होगा तभी कांग्रेस की भगदड़ रुकेगी और आलाकमान की रिट चलेगी, नहीं तो पंजाब की तरह के घटनाक्रम आलाकमान की किरकिरी कराते रहेंगे और कार्यकर्ता हताशा में अपना वजूद बरकरार रखने के लिए बाहर जाते रहेंगे. तो अभी जरूरत इस पर विचार करने की है कि कांग्रेस कैसे प्रासंगिक बने. अब अालाकमान और उनके सलाहकारों और शुभचिंतकों को इस दिशा में सोचने की जरूरत है तभी कुछ बात बनेगी.


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