त्योहार, महामारी और पटाखे

देश और राज्य कोरोना के कहर से फिलहाल राहत महसूस कर रहा है. वैक्सीनेशन का काम भी देश में तेज गति से चल रहा है, लेकिन अभी भी खतरा बरकरार है और किसी भी तरह की लापरवाही और निश्चिंतता के लिए कोई जगह नहीं है. आजकल देश और राज्य में दिवाली की सरगर्मी बढ़ गयी है, वैसे भी इस त्योहार में काफी तादाद  में लोग खरीदारी करने और अन्य वजहों से बाहर निकलते हैं जिससे भीड़भाड़ स्वाभाविक है, लेकिन यह कोई आम समय नहीं है. देश कोरोना से बाहर निकल रहा है. धीरे-धीरे प्रतिबंधों में छूट दी गयी है. आर्थिक गतिविधियों में गति आ रही है अब यह हमारे ऊपर है कि हम कैसे बर्ताव करें कि यह ढील स्थाई हो और फिर तालाबंदी जैसी नौबत ना आये. इसलिए जब तक शत प्रतिशत वैक्सीनेशन नहीं हो जाता तब तक कोरोना उपयुक्त व्यवहार का अच्‍छे से पालन करने के सिवाय हमारे पास कोई चारा नहीं है. दिवाली आते ही पटाखों को लेकर काफी हो हल्ला शुरू हो जाता है, हाय -तौबा मच जाती है. ऐसा माहौल बनाने का प्रयास हो जाता है की पटाखे नहीं छोड़े जाएंगे, तो पूजा ही नहीं होगी. अरे भाई जब दीपावली की शुरुआत हुई तब क्या पटाखे थे? कालांतर में यह जुड़ गया और आनंद और उत्सव का हिस्‍सा बन गया, लेकिन जिस तरह इसके अधाधुंध प्रयोग ने तमाम तरह की स्वास्थ्यगत और पर्यावरण से सबंधित परेशानियां खड़ी करना शुरू कर दिया तो इस पर कुछ प्रतिबंधात्‍मक  कदम उठाना भी जरूरी हो गया. माना की इससे बहुत लोगों का रोजगार जुड़ा है तो कई चीजें हैं जो लोगों को अच्‍छा रोजगार उपलब्ध कर सकती है, उन्हें अच्‍छा खासा लाभ दे सकती है. लेकिन वह लोगों के स्वास्थ्य के साथ-साथ पर्यावरण के प्रतिकूल है तो क्या उन्हें इजाजत दी जाय, कदापि नहीं. यही बात पटाखों पर भी लागू होती है. हर चीज को धर्म या उत्सव का अंग आंख मूंद कर नहीं मानना चाहिए. हमारे लिए, अच्छे पर्यावरण के लिए क्या सही है क्या गलत है वह जानकर ही किसी चीज का उपयोग किया जाना चाहिए. 

न्यायालय या प्रशासन कोई पाबंदी लगाता है, कोई रोक लगाता है तो उसके पीछे कोई ना कोई सोची समझी नीति होती है, उद्देश्य होता है इसका भान हमें रखना चाहिये. हम दिल खोलकर माता लक्ष्मी की, भगवान राम की पूजा-अर्चना करें और उनसे इस धरा-धाम को, जीवन को सुजलाम-सुफलाम करने की प्रार्थना करें, जी भरकर उत्सव का आनंद उठाये, लेकिन ऐसा करते समय उन चीजों से सख्ती से परहेज करें जो कोरोना महामारी को फिर सिर उठाने का मौका दे सकती हैं या वातावरण को प्रदूषित कर और कई तरह की स्वास्थ्यगत परेशानियों का कारक बन सकती हैं, इसी में हम सबका और देश-दुनिया का भला है. वैसे भी देश में हर तरह का प्रदूषण खतरे की घंटी बजा रहा है. यह होने का सबसे प्रमुख कारण हमारा पर्यावरण प्रतिकूल आचरण ही रहा है, हमने विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण के उन चिरंतन सिद्धांतों का पालन नहीं किया जो पर्यावरणीय संतुलन के लिए जरूरी ही नहीं है, बल्कि अनिवार्य हैं. इसलिए हम ऐसा कुछ ना करें जिससे कोरोना फिर कहर बने या हमारे स्वास्थ्य के लिए, पर्यावरण के लिए नई समस्या खड़ी हो. देश की सरकार, जनता और कोरोना योद्धाओं ने बड़ी मेहनत से कोरोना को काबू में किया है हमारी जरा सी लापरवाही ि‍स्थति को पुन: बिगाड़ सकती है, इसलिए त्योहार की इस बेला पर हम सरकार द्वारा तय मानदंडों का पालन करते हुए त्योहार को मनाये और अपने स्वास्थ्य की, पर्यावरण की रक्षा करें साथ ही उन हर बिंदुओं को भी त्यागें जिससे पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता है.

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