ये तो होना ही था

जब गीदड़ की मौत आती है तो वह गांव की अोर भागता है। यह पुरानी कहावत है, जो पंजाब के सन्दर्भ में कांग्रेस पर पूरी तरह फिट बैठती है। जिस तरह से कांग्रेस आलाकमान ने अमरिंदर सिंह जैसे पुराने, अनुभवी और वफादार नेता को दरकिनार किया और उनकी जगह अपने बड़बोलेपन और बेसब्रे व्यवहार के लिए जाने जाने वाले नवजोत सिंह सिद्धू पर भरोसा किया और वह भी चुनाव से कुछ महीने पहले और जिस तरह उसके बाद वहां के हालात नजर आ रहे हैं, उससे राजनीतिक विश्लेषक और कांग्रेसी दोनों उहापोह में हैं कि इतना सब कर आखिर कांग्रेस ने क्या हासिल किया है। कारण आज जिस तरह का बागी तेवर अमरिंदर सिंह ने अख्तियार किया है, नयी पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया है  और कांग्रेस के स्थानीय और राष्ट्रीय नेतृत्व पर हमले तेज कर दिए हैं। इससे तो कांग्रेस की स्थिति बहुत अच्छी नहीं लग रही है। विशेषकर उस माहौल में जब पार्टी के संगठन का नेतृत्व सिद्धू जैसे नेता के हाथ में है, जो अपनी नाराजगी या आक्रोश व्यक्त करने का सिर्फ एक ही तरीका जानते हैं और वह है सार्वजनिक रूप से फूट पड़ना। अभी हाल में जिस तरह का झटका उन्होंने अालाकमान को दिया है और जिसकी देशव्यापी गूंज हुई है, उसके मद्देनजर यह काफी दिलचस्प होगा कि कांग्रेस आलाकमान आगे उन्हें कैसे नियंत्रित करता है। कारण पंजाब का उन देश के चंद सूबों में शुमार है, जहां कांग्रेस का संगठन जीवित है। आज लगता है कि चाहे जिस कारण से अपने प्रयोगों से आलाकमान ने वहां भी बना - बनाया खेल बिगाड़ने का काम किया है। कांग्रेस जैसी पार्टी के लिए जो देश में अपने जन्म से लेकर अब तक के इतिहास का सबसे कठिन दौर का सामना कर रही है, देश के अधिकांश सूबों में अपने अस्तित्व को बरकरार रखने की लड़ाई लड़ रही है, अपने ही हाथों अपना खेल बिगाड़ने का संकेत देना जो प्रथम दृष्टया आलाकमान के अहम् को तुष्ट करने की कार्रवाई लगे कदापि सही नहीं है। आज आलाकमान की सबसे बड़ी चुनौती पंजाब को भी उत्तर प्रदेश और बिहार कांग्रेस की राह पर जाने से बचाना है और जिस तरह के तेवर अमरिंदर सिंह दिखा रहे हैं और बेसब्रे सिद्धू जिस तरह  की भावभंगिमा का प्रदर्शन कर रहे हैं, उसके मद्देनजर ऐसा होता नहीं दिख रहा है।  पंजाब में जो कुछ हुआ जिस तरह आलाकमान ने वहां बदलाव किया उससे दो बात साफ़ है कि अभी भी पार्टी की इतनी दुरावस्था होने के बावजूद भी आलाकमान की रीति- नीति और कार्य करने की शैली में कोई बदलाव नहीं हुआ है और दूसरा यह है कि आज देश की राजनीति किस तरह बदल चुकी है और उसमें प्रासंगिक बने रहने के लिए कांग्रेस को अपनी रीति नीति और शैली में बदलाव करने होंगे, इसका एहसास भी कांग्रेस में आज कल निर्णय लेने का जो सर्वोच्च निर्णायक मंडल है, उसे नहीं हुआ है। उन्हें अभी भी लगता है कि अतीत की तरह सत्ताधारी दल की गलतियों और उसे कांग्रेस द्वारा भुनाने से ही कांग्रेस वापस सत्ता में आ जायेगी। पार्टी के भविष्य को लेकर चिंतित नेता,  जी -२३ के नेता लगातार सर पीट रहे हैं कि इस बार वैसा नहीं होने वाला। पार्टी के कार्यकर्ताओं-नेताओं में व्याप्त विचारधारात्मक भ्रम, गुटवाद, सांगठनिक कमजोरी, सबका एक साथ इलाज करना होगा, उस पर ध्यान दिया ही नहीं जा रहा है। सिर्फ बयान बहादुरी और गांधी परिवार की भक्ति का प्रदर्शन करने से कुछ नहीं होगा। वही होगा जो हो  रहा है, कारण जिस तरह काम चल रहा है ऐसा होना ही है कारण पार्टी के दुरावस्था के कारणों पर मंथन कर उसका इलाज करने की तैयारी ही कांग्रेस नेतृत्व नहीं दिखा रहा है।


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