संयुक्‍त प्रयास की जरूरत

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 2005 के बाद पहली बार वायु गुणवत्ता दिशा-निर्देशों में संशोधन कर नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। ये हमारी सेहत के लिए नुकसानदेह प्रदूषकों पर लगाम कसने और उनकी सीमा निर्धारित करने का काम करते हैं। ये वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य प्रभावों का आंकलन भी प्रदान करते हैं। इसके चलते इन्हें कई सरकारें अपने देश के वायु गुणवत्ता मानकों का आधार बनाती हैं। अनुमान है कि हर साल वायु प्रदूषण से 70 लाख लोगों की समय से पहले मौत हो जाती है। बच्चों में इससे फेफड़ों व श्वास संबंधी रोग हो सकते हैं, जैसे अस्थमा। वयस्कों में, इस्केमिक हृदय रोग और स्ट्रोक बाहरी वायु प्रदूषण से होने वाली प्रीमैच्योर मौत के सबसे आम कारण हैं। इसके डायबिटीज और न्यूरोडीजेनेरेटिव स्थितियों जैसे अन्य प्रभाव भी सामने आ रहे हैं। यह वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारी के बोझ को अस्वास्थ्यकर आहार और तंबाकू, धूम्रपान जैसे अन्य प्रमुख स्वास्थ्य जोखिमों के बराबर बना देता है। 

गौरतलब है कि भारत के मौजूदा राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों (एनएएक्यूएस), डब्ल्यूएचओ द्वारा पूर्व में निर्धारित वायु गुणवत्ता संबंधी दिशा-निर्देशों के मुकाबले पहले ही ढीले ढाले हैं। इससे शहरों को वायु प्रदूषण के स्थानीय स्रोतों के आकलन के जरिए अंतरिम लक्ष्य पाने के लिए जरूरी प्रयासों पर विचार का मौका मिलता है। 2022 में भारत के एनएएक्यूएस में सुधार होंगे, तब डब्ल्यूएचओ के अधिक कड़े दिशा-निर्देश वायु प्रदूषण से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में अधिक ध्यान देने के लिए मजबूर करेंगे। भारत के राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनकैप) का लक्ष्य 2024 तक, 2017 के स्तर को आधार वर्ष मानते हुए, पीएम 2.5 और पीएम 10 सांद्रता को 20-30 फीसदी तक कम करना है। डब्ल्यूएचओ के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची से भारत के शीर्ष 10 प्रदूषित शहरों को शामिल करते हुए, एनकैप के लिए 122 शहरों की पहचान की गई, जो 2011-15 की अवधि के लिए भारत के एनएएक्यूएस को पूरा नहीं करते थे। ग्रीनपीस इंडिया के अनुसार दुनियाभर के 10 शहरों में वायु प्रदूषण के कारण समय से पहले होने वाली मौतें और वित्तीय नुकसान की गणना करते हुए, दिल्ली में साल 2020 में सबसे अधिक 57,000 मौतें हुईं। वायु प्रदूषण के कारण जीडीपी को 14 फीसदी का नुकसान हुआ। एक साधारण समझ है कि हम वायु प्रदूषण से जितना दूर रहेंगे, उतने सेहतमंद भी रहेंगे। डब्ल्यूएचओ ने नए वायु गुणवत्ता दिशा-निर्देश के तहत पीएम 2.5 और पीएम 10 के एक्स्पोजर लेवल में कटौती कर हवा में पार्टिकुलेट मैटर की मौजूदगी नियंत्रित करने के और ज्यादा प्रयास करने की जरूरत पर फिर जोर दिया है। मगर भारत जैसे देशों के लिए पार्टिकुलेट मैटर संबंधी कड़े दिशा-निर्देशों का पालन बड़ी चुनौती है। डब्ल्यूएचओ ने वायु प्रदूषण के प्रमुख घटकों के लिए और ज्यादा कड़े मानक सुझाए हैं। जैसे 24 घंटे में पीएम 2.5 का सुरक्षित संघनन औसत 25 यूजी/प्रति घन मीटर के बजाय अब 15 यूजी/घन मीटर निर्धारित किया है। आज हालत यह है कि भारत में पीएम 2.5 के मौजूदा शिथिल मानक 40 यूजी/घन मीटर है, जबकि डब्ल्यूचओ ने वर्ष 2005 में इसकी वार्षिक सीमा 10 यूजी/घन मीटर निर्धारित की थी। हमें हेल्थ डेटा को और मजबूत करना होगा और उसके मुताबिक राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम को और बेहतर बनाना होगा। वायु प्रदूषण को कम करने के लिए संयुक्त प्रयासों की जरूरत हैै।

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