आर्थिक संकट का खतरा

कश्मीर में गैर कश्मीरियों की चुन-चुन कर हत्या के खौफनाक सिलसिले ने केंद्र सरकार के समक्ष जो गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है, उसका सामना न केवल दृढ़ता से किया जाना चाहिए, बल्कि ऐसा होते हुए दिखना भी चाहिए। वास्तव में अब होना यह चाहिए कि आतंकी पनाह मांगते नजर आएं। उनके खिलाफ ऐसी कठोरतम कार्रवाई होनी चाहिए, जिसकी वे कल्पना भी न कर रहे हों। कश्मीर में नए सिरे से सिर उठाते आतंकियों का दमन इतनी निर्ममता से करने की जरूरत है कि उनके खुले-छिपे समर्थकों को भी यह समझ आ जाए कि उनका खूनी खेल हमेशा-हमेशा के लिए खत्म होकर रहेगा। हाल के दिनों में कश्मीर में गैर कश्मीरियों की हत्या ने यह स्पष्ट किया है कि वहां मार-काट मचा रहे आतंकियों के खिलाफ जारी मौजूदा रणनीति में बदलाव की जरूरत है। आतंकियों और उनके समर्थकों के दुस्साहस का दमन करने के साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कश्मीर से न तो कश्मीरी हिंदुओं और सिखों का पलायन होने पाए और न ही वहां रह रहे अन्य राज्यों और खासकर यूपी-बिहार के मजदूरों का। यह ठीक नहीं कि अपने साथियों की हत्याओं से डरे-सहमे मजदूरों ने पलायन करना शुरू कर दिया है। यदि यह पलायन नहीं रुका तो दहशत बढ़ने के साथ ही कश्मीर की आर्थिकगतिविधियां भी ठप हो सकती हैं, क्योंकि उनके बगैर घाटी का काम चलने वाला नहीं है। बेहतर हो कि इस बात को कश्मीरी जनता भी समङो और वह अन्य प्रांतों के मजदूरों को भरोसा दिलाने के लिए आगे आए। यह काम निदरेष-निहत्थे लोगों को निशाना बना रहे आतंकियों की निंदा करने की रस्म अदायगी से होने वाला नहीं है।  दुर्भाग्य से कश्मीर में असर रखने वाले दल और खासकर नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के नेता ऐसा ही करते दिख रहे हैं। जहां महबूबा मुफ्ती आतंकियों के खिलाफ एक शब्द कहने को तैयार नहीं, वहीं फारूक अब्दुल्ला गैर कश्मीरियों की हत्या को कश्मीर के खिलाफ साजिश बता रहे हैं। वह यह नहीं बताना चाहते कि यह साजिश कौन कर रहा है और किसके इशारे पर? यह समझने की जरूरत है कि ऐसे नेता कश्मीर के हालात सुधारने में मददगार नहीं बन सकते। वैसे भी यह किसी से छिपा नहीं कि अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद उन्होंने किस तरह जहर उगलने के साथ देश को धमकाने वाले बयान दिए थे। ऐसे नेताओं को हतोत्साहित करना होगा और इसमें सफलता तब मिलेगी जब शेष देश से पक्ष-विपक्ष के दलों की ओर से एक सुर में आवाज उठाई जाएगी। कश्मीर से उठते सवाल दलगत राजनीति का नहीं, राष्ट्र के मान-सम्मान का विषय हैं।


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