प्राकृतिक आपदा

केरल और उत्तराखंड सहित देश के कई राज्यों से कुदरती कहर की जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे रोंगटे खड़े कर देती हैं। भारी बारिश से बाढ़, नदी-नालों में उफान और जमीन धंसने जैसी घटनाएं हो रही हैं। मकान और गाड़ियां डिब्बियों की तरह बह जा रहे हैं। उत्तराखंड में पिछले तीन दिनों में चौबीस से ज्यादा लोगों के मारे जाने की खबर है। केरल में भी जमीन धंसने की घटनाओं में अब तक पच्चीस लोगों की जान जा चुकी है। अरबों की संपत्ति का नुकसान हुआ, सो अलग। ऐसा भी नहीं है कि इस तरह की प्राकृतिक आपदा का सामना हमें पहली बार करना पड़ रहा है। लगातार बारिश से जान-माल के नुकसान की घटनाएं होती ही रही हैं। फर्क अब सिर्फ यह आया है कि पहले के मुकाबले ऐसी आपदाओं की तीव्रता कई गुना बढ़ गई है। इसलिए ये ज्यादा घातक साबित हो रही हैं। चिंता की बात तो यह है कि जब हमारे पास मौसम की चेतावनी देने वाला संपूर्ण और पुख्ता वैज्ञानिक तंत्र है, तब भी हम तबाही का मंजर देखने को मजबूर हैं। इस तबाही का एक बड़ा कारण यह है कि हम पिछली आपदाओं से कोई सबक नहीं ले रहे। भारत ही नहीं, दुनिया के ज्यादातर देश जलवायु संकट से जूझ रहे हैं। वैश्विक तापमान बढ़ने से मौसम चक्र भी गड़बड़ा गया है। पिछले कुछ सालों में तो भारी बारिश ने कई देशों में तबाही मचाई है। फ्रांस, जर्मनी सहित कई यूरोपीय देशों में हाल में जिस तरह की बारिश और बाढ़ आई, उसने सदियों पुराने रेकार्ड तोड़ डाले। यही सब हम अपने यहां भी देख रहे हैं। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में बादल फटने की घटनाएं जिस तेजी से बढ़ी हैं, वह खतरे की घंटी है। बिजली गिरने की घटनाएं भी बढ़ी हैं। हर साल कई लोग इसके शिकार होते हैं। इसलिए जरूरी है कि हम इन कुदरती घटनाओं को हादसे से ज्यादा सबक के रूप में लें, तभी इनसे पार पा पाएंगे। गौरतलब है कि धरती का पर्यावरण बेहद खराब हो चुका है। धरती को बचाने के लिए पर्यावरण विज्ञानी चेतावनियां जारी कर रहे हैं। वनों के घटते क्षेत्रफल से लेकर समुद्रों के पिघलने की दर सबको डरा रही है। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि हम प्राकृतिक आपदाओं से निजात कैसे पाएं?  यह सही है कि प्राकृतिक आपदाओं की रफ्तार और तीव्रता बढ़ी है। लेकिन इससे भी ज्यादा गंभीर संकट यह खड़ा हो गया है कि मानव जनित समस्याएं इन्हें और उग्र बना दे रही हैं। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्यों में जिस तरह से निर्माण गतिविधियां बढ़ी हैं, उससे भी संकट बढ़ा है। पहाड़ों में खनन और कटाई से लेकर दूसरी मशीनी गतिविधियां घातक ही साबित हुई हैं। पहाड़ी इलाकों में बाढ़ और नदियों के उफान की घटनाओं के पीछे बड़ा कारण नदियों का प्रवाह रुक जाना है। पहाड़ों पर बहुमंजिला इमारतें बनाना कितना खतरनाक सिद्ध हुआ है, यह हमने देख ही लिया। केरल जैसे तटीय राज्यों में तटों के किनारे बढ़ता अतिक्रमण संकट का कारण बनता जा रहा है। सवाल यह है कि आखिर लोगों को नदियों के किनारे बड़े-बड़े निर्माण करने ही क्यों दिए जाते हैं। ऐसी आपदाओं का समाधान सिर्फ मुआवजा बांटने से नहीं होता, यह तो एक फौरी मदद भर होती है। कुदरत के कहर से मुक्ति पाने के लिए ऐसी ठोस नीतियों पर काम होना चाहिए, जो लोगों को मरने से बचा सकें।


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