माँ लक्ष्मी का प्रमुख दिन है 'लक्ष्मी पूजन'


ज्योतिषाचार्य पंडित अतुल शास्त्री जी के अनुसार दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त 4 नवंबर को शाम 6 बजकर 9 मिनट से 8 बजकर 4 मिनट तक है। 

दीपावली के दिन लक्ष्मी जी की पूजा कैसे की जाए ? इस सवाल के जवाब में ज्योतिषाचार्य पंडित अतुल शास्त्री जी कहते हैं, ''पूजा स्थल पर एक चौकी रखें और लाल कपड़ा बिछाकर उस पर लक्ष्मी जी और गणेश जी की मूर्ति रखें या दीवार पर लक्ष्मी जी का चित्र लगाएं। चौकी के पास जल से भरा एक कलश रखें। माता लक्ष्मी और गणेश जी की मूर्ति पर तिलक लगाएं और दीपक जलाकर जल, मौली, चावल, फल, गुड़, हल्दी, अबीर-गुलाल आदि अर्पित करें और माता महालक्ष्मी की स्तुति करें। मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए उनके बायीं ओर भगवान विष्णु की प्रतिमा को स्थापित करें।'' यूँ तो प्रतयेक जन अपनी अपनी सामर्थ्य अनुसार माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए मिष्ठान्न का भोग लगाते हैं परन्तु माँ लक्ष्मी को नारियल अति प्रिय है, जिसे श्रीफल भी कहा जाता है। लक्ष्मी जी को नारियल का लड्डू, कच्चा नारियल और जल से भरा नारियल अर्पित करने से देवी लक्ष्मी आप पर प्रसन्न हो सकती हैं और आपको उनकी कृपा प्राप्त  होगी। दीपावली के दिन माँ लक्ष्मी को खील बताशे का भी भोग लगाया जाता है क्योंकि बताशे का संबंध चंद्रमा से है और चंद्रमा को देवी लक्ष्मी का भाई माना जाता है।

देवी लक्ष्मी को धन और सम्रद्धि की देवी कहा जाता है। सनातन धर्म के विष्णु पुराण में बताया गया है कि लक्ष्मी जी भृगु और ख्वाती की पुत्री हैं और स्वर्ग में यह वास करती थी। समुद्रमंथन के समय लक्ष्मी जी की महिमा का व्याख्यान वेदों में बताया गया है। लक्ष्मी जी ने विष्णु जी को अपने पति के रुप में वरण किया जिससे इनकी शक्तियां और प्रबल हुई मानी जाती हैं। लक्ष्मी का अभिषेक दो हाथी करते हैं। वह कमल के आसन पर विराजमान है। लक्ष्मी जी के पूजन में कमल का विशेष महत्त्व बताया गया है। क्योकि यह फूल कोमलता का प्रतीक है इसलिए माँ लक्ष्मी जी की पूजा में इसका स्थान आता है। लक्ष्मी जी के चार हाथ बताये गये हैं। वे एक लक्ष्य और चार प्रकृतियों (दूरदर्शिता, दृढ़ संकल्प, श्रमशीलता एवं व्यवस्था शक्ति) के प्रतीक हैं और माँ लक्ष्मी जी सभी हाथों से अपने भक्तों पर आशीर्वाद की वर्षा करती हैं। इनका वाहन उल्लू को बताया गया है जो निर्भीकता का सूचक है। माँ लक्ष्मी जी की मुख्य पूजा तो वैसे दिवाली पर की जाती है किन्तु लक्ष्मी पूजा निरंतर करना और भी ज्यादा फलदायक माना जाता है।

दीपावली के सन्दर्भ में ज्योतिषाचार्य पंडित अतुल शास्त्री जी यह भी बताते हैं कि वैदिक काल में अनेक प्रकार के यज्ञ हुआ करते थे। यज्ञ उस युग का सबसे बड़ा सांस्कृतिक समारोह होता था। ये यज्ञ साधारण भी होते थे--और असाधारण भी। कुछ यज्ञों को तो राजा-महाराजा ही कर सकते थे, जैसे अश्वमेध, राजसूय, आदि। पर कुछ यज्ञ नियमित रूप से सब आर्य गृहस्थों को करने पड़ते थे। इन यज्ञों का क्रम गोपद ब्राह्मण में इस प्रकार बताया गया है- 

अग्न्याधान, पूर्णाहुति, अग्निहोत्र, दशपूर्णयास, आग्रहायण चातुर्मास्य, पशुवध, अग्नि-ष्टोम, राजसूय, बाजपेय, अश्वमेध, पुरूषमेध, सर्वमेध, दक्षिणावाले बहुत दक्षिणा-वाले और असंख्य दक्षिणावाले। इनमें अग्न्याधान और अग्निहोत्र प्रतिदिन के यज्ञ थे। हर अमावस और पूर्णिमा के दिन दशपूर्णमास यज्ञ होते थे। फाल्गुन पूर्णिमा, आषाढ़ पूर्णिमा और कार्तिक पूर्णिमा को चातुर्मास्य यज्ञ किये जाते थे। उतरायण-दक्षिणायन के आरम्भ में जो यज्ञ होते थे--वे आग्रहायण वा नवसस्येष्ठि यज्ञ कहलाते थे। इसी प्रकार भिन्न-भिन्न प्रकार के उद्देश्यों को लेकर भिन्न-भिन्न यज्ञ होते थे। यह आग्रहायण या नवसस्येष्ठि यज्ञ ही आगे दीपावली का त्यौहार बन गया।

हिन्दू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार रावण पर विजय प्राप्त कर तथा चौदह वर्षों का वनवास समाप्त कर प्रभु श्रीराम जिस दिन अपने राज्य अयोध्या पहुँचे उस दिन सभी अयोध्यावासियों ने दीपक जलाकर उनका स्वागत किया और तब से दीपावली मनाई जाने लगी।


Post a Comment

[blogger]

MKRdezign

Contact Form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget