आखिर जिम्मेदार कौन ?

दिल्ली में वायु प्रदूषण के संकट से निपटने के लिए अब पूर्णबंदी जैसे सुझाव पर विचार हो रहा है। यह सुझाव हालात की गंभीरता को देखते हुए सर्वोच्च अदालत ने दिया था और दिल्ली सरकार से पूछा था कि क्या ऐसा संभव हो सकता है। जवाब में दिल्ली सरकार ने इस पर सहमति जताई और बताया कि ऐसा किया जा सकता है, पर दिल्ली के साथ यह कदम पड़ोसी राज्यों हरियाणा और उत्तर प्रदेश को भी उठाने होंगे, तभी कुछ नतीजा निकलेगा। गौरतलब है कि वायु प्रदूषण से बिगड़े हालात पर प्रधान न्यायाधीश की पीठ सुनवाई कर रही है।

अदालत ने प्रदूषण रोकने के उपायों को लेकर दिल्ली और केंद्र सरकार को सख्त हिदायतें दी हैं। हैरानी की बात यह है कि केंद्र और दिल्ली सरकार हरकत में तब आर्इं जब सर्वोच्च अदालत ने प्रदूषण से गंभीर होते हालात पर चिंता जताई और दोनों सरकारों से सवाल-जवाब किए। सवाल है कि अगर सर्वोच्च अदालत अपनी तरफ से कोई सवाल-जवाब न करे या निर्देश न दे तो क्या सरकारों को अपनी तरफ से कोई पहल करने की जरूरत महसूस नहीं होनी चाहिए! जो काम केंद्र और दिल्ली सरकार सर्वोच्च अदालत के कहने पर अब कर रही हैं, वे तो पहले भी किए जा सकते थे।

दरअसल दिल्ली में वायु प्रदूषण का मुद्दा इसलिए भी संकट बन गया है क्योंकि किसी भी सरकार ने इसे लेकर गंभीरता नहीं दिखाई। प्रदूषण से निपटने में नाकाम रहने के लिए आज भाजपा और कांग्रेस दिल्ली सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, तो दिल्ली सरकार अपनी नाकामियों के लिए पिछली सरकारों तथा पड़ोसी राज्यों को जिम्मेदार ठहराती रही है। इसी तरह दिल्ली सरकार और नगर निगम एक दूसरे को दोषी ठहराने से बाज नहीं आते। यह कोई आज की बात नहीं है। दिल्ली में सालों से कचरे के पहाड़ खड़े हुए हैं।

आखिर क्यों? क्या इन्हें हटवाने का काम इतना कठिन है, जिसमें सालों लगने चाहिए? पिछले तीन दशकों में दिल्ली की सूरत बदल गई, राष्ट्रमंडल खेल जैसे आयोजन हो गए, सेंट्रल विस्टा परियोजना का काम जोरों पर चल ही रहा है, पर कचरे के इन ढेरों को हटवाने के लिए किसी सरकार ने कोई बड़ा कदम नहीं उठाया। जबकि दिल्ली में भाजपा, कांग्रेस भी लंबे समय तक शासन कर चुकी हैं। आम आदमी पार्टी का यह लगातार दूसरा कार्यकाल है। इससे तो लगता है कि सरकारों और राजनीतिक दलों की मंशा कचरे के पहाड़ हटवाने और वायु प्रदूषण से निपटने के बजाय राजनीति करने में ही ज्यादा है। वरना प्रदूषण रोकने के प्रयास सालों पहले शुरू नहीं हो गए होते!

अभी तक कहा जाता रहा है कि दिल्ली में प्रदूषण का बड़ा कारण पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में पराली का जलना है। पर केंद्र सरकार ने अदालत को बताया है कि दिल्ली के प्रदूषण में पराली के धुएं की भागीदारी केवल दस फीसद है। हालांकि कुछ अनुमान पच्चीस से पैंतीस फीसद के भी लगते रहे हैं। यानी पचहत्तर फीसद कारणों में उद्योग, निर्माण कार्यों से होने वाली धूल और वाहनों खासतौर से पुराने वाहनों का बढ़ता दबाव हैं। जाहिर है, जरूरत इनसे निपटने की है। हाल-फिलहाल फौरी तौर पर प्रदूषण कम करने के लिए जो भी जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं, वे कोई स्थायी समाधान नहीं हैं। दिल्ली सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती मियाद पूरी कर चुके वाहनों को सड़कों पर उतरने से रोकने की है। इसमें नागरिकों की भी समान भागीदारी जरूरी है। देश की राजधानी कम से कम प्रदूषित हो, इसके लिए दीर्घकालिक नीतियों पर काम करने की जरूरत है, न कि एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराने या असहयोग की राजनीति करने की।


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