मुफ्त की बीमारी

आखिरकार पंजाब सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं को बिजली दरों में तीन रुपए की कटौती करके दिवाली का तोहफा दे दिया। स्वाभाविक ही इससे दूसरी सरकारों पर दबाव बनेगा। उत्तर प्रदेश में बिजली की दरें सबसे अधिक हैं और वहां के किसान लगातार मांग कर रहे हैं कि इन्हें घटाया जाए। मगर राजस्व घाटे को देखते हुए सरकार में ऐसा कोई कदम उठाने से हिचक बनी हुई है। हालांकि पंजाब सरकार ने बिजली की दरों में कटौती का जो एेलान किया है, वह कोई पहला और नया प्रयोग नहीं है।

पहले भी वहां की सरकारें किसानों आदि को मुफ्त बिजली का उपहार देती रही हैं। अच्छी बात है कि सरकारें अपने नागरिकों पर करों का बोझ कम से कम लादें। मगर कोई भी सरकार ऐसा तभी कर सकती है, जब उसका खजाना भरा हो, कमाई खूब हो रही हो। जबकि पंजाब सरकार के सामने ऐसी स्थिति नहीं है। अकेले इस फैसले से उसे सालाना तीन हजार तीन सौ सोलह करोड़ रुपए राजस्व का नुकसान उठाना पड़ेगा। उसके पास इतनी इफरात कमाई हो, मानना मुश्किल है। जाहिर है, इसकी भरपाई उसे दूसरी जगहों से करनी पड़ेगी। कुछ योजनाओं पर विराम लगाना पड़ेगा, कुछ करों में बढ़ोतरी करनी पड़ेगी। दरअसल, पंजाब सरकार के इस फैसले के पीछे की नीयत को समझना मुश्किल नहीं है। कुछ महीनों में वहां विधानसभा के चुनाव होने हैं। आम आदमी पार्टी ने अपना चुनाव अभियान शुरू करते हुए पहले ही घोषणा कर दी थी कि अगर उसकी सरकार बनी, तो वह घरेलू उपभोक्ताओं को तीन सौ यूनिट तक बिजली मुफ्त देगी। वह दिल्ली में कई साल से मुफ्त बिजली दे रही है और उपभोक्ताओं पर इसका सकारात्मक असर देखा गया है। इसलिए उसने वही फार्मूला पंजाब में भी लागू करने का वादा कर दिया। यह दूसरे दलों के लिए बड़ी चुनौती थी। अकाली दल ने भी मुफ्त बिजली की योजना घोषित कर दी। फिर आनन-फानन में चन्नी सरकार ने इस पर अमल भी कर लिया। हालांकि आम आदमी पार्टी ने यह वादा उत्तर प्रदेश और गोवा में भी किया है। पर वहां की सरकारें इसे लेकर कोई हड़बड़ी नहीं दिखा रहीं। आम आदमी पार्टी के वादे को मात देने के लिए कांग्रेस ने जरूर उत्तर प्रदेश में घोषणा कर दी है कि अगर वह सत्ता में आई तो किसानों की बिजली के पिछले सारे बकाए माफ कर देगी। समाजवादी पार्टी भी इस फार्मूले को आजमाना चाहेगी, क्योंकि वह पहले ऐसा कर चुकी है। चुनावों के वक्त इस तरह लोगों को मुफ्त में सुविधाएं देने के वादे अक्सर राजनीतिक दल करते हैं। हैरानी की बात नहीं कि ऐसे वादे लोगों को आकर्षित भी करते हैं। खासकर गरीबी उन्मूलन, किसानों और गांवों में सुविधाओं, शिक्षा, रोजगार से जुड़ी ऐसी मुफ्त की योजनाओं की घोषणाएं राजनीतिक दल खूब करते हैं। पर हकीकत यह है कि उन वादों का अब तक समाज पर कोई सकारात्मक असर नहीं पड़ा है, सरकारों के खजाने जरूर खाली हो गए हैं। शायद राजनीतिक दल इस हकीकत को स्वीकार नहीं करना चाहते कि देश और समाज की तरक्की मुफ्त की योजनाओं से नहीं, उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करके होती है। और यह तभी संभव होगा, जब रोजगार और शिक्षा के अवसर बेहतर किए जाएं। इसलिए मुफ्त या न्यूनतम दर पर बिजली देने की योजना भी सरकार पर राजस्व का बोझ और बिजली की फिजूलखर्ची ही बढ़ाएगी, लोगों की अर्थिक स्थिति पर इसका कोई सीधा असर नहीं पड़ने वाला। आम आदमी पार्टी का यह झुनझुना व्यावहारिक नहीं माना जा सकता।


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