मौत का जिम्‍मेदार कौन?

महाराष्ट्र के एक और सरकारी अस्पताल में आग लगने से दस कोविड मरीजों की मौत हो गई। आग गहन चिकित्सा कक्ष में लगी। आग का कारण तारों से चिनगारी फूटना बताया जा रहा है। ज्यादातर आग की घटनाओं में यही कारण बताया जाता है। मगर हैरानी की बात है कि आज तक इस समस्या के समाधान के लिए कहीं भी पुख्ता इंतजाम करने के प्रयास नहीं देखे गए। ज्यादातर आग की घटनाएं सरकारी अस्पतालों में ही क्यों होती हैं, यह सवाल भी आज तक अनुत्तरित बना हुआ है। महाराष्ट्र के अहमदनगर में हुई ताजा घटना सुबह करीब ग्यारह बजे हुई। यानी बिजलीकर्मी अपने काम पर मुस्तैदी से तैनात रहे होंगे। जैसा कि रात को होने वाली इस तरह की घटनाओं में प्राय: तर्क दिया जाता है कि कर्मचारी नींद में रहे होंगे या कर्मचारियों की संख्या कम थी वगैरह। ऐसा तर्क इस मामले में नहीं दिया जा सकता। हर घटना की तरह इसकी भी सरकार ने जांच के आदेश दे दिए हैं। मगर सवाल है कि जिस भी लापरवाही के चलते यह घटना हुई और उसमें दस लोगों की जान चली गई, उसकी भरपाई कैसे होगी। जिन परिवारों के सदस्य बेमौत मारे गए, उन्हें सहारा कौन देगा। इनकी मौत का जिम्‍मेदार कौन है? सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की कमी, कर्मचारियों के मनमाना और उपेक्षापूर्ण व्यवहार आदि को लेकर शिकायतें आम हैं। यह भी सबको पता है कि आमतौर पर सरकारी अस्पतालों में वही आते हैं, जो निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च उठा पाने में सक्षम नहीं हैं। इसलिए भी वहां के कर्मियों में उन मरीजों के प्रति उपेक्षा का भाव अधिक देखा जाता है। दूसरे कर्मी भी उसी भाव से बिजली, पानी आदि जैसे बाकी संसाधनों का रखरखाव करते पाए जाते हैं। सरकारी अस्पतालों में बिजली, मरम्मत आदि का काम लोक निर्माण विभाग के जिम्मे होता है। फिर आधुनिक संसाधनों को लेकर उनमें उदासीनता का भाव इसलिए भी बना रहता है कि उन्हें पैसे की कमी का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा कमीशनखोरी बड़ा रोग है, जिसके चलते नए उपकरण आदि लगाने के बजाय पुराने उपकरणों की मरम्मत करके काम चलाने का प्रयास अधिक देखा जाता है। यही वजह है कि सरकारी अस्पतालों में बिजली के उपकरणों में आग लगने की घटनाएं अधिक देखी जाती हैं। अहमदनगर की घटना महाराष्ट्र में हुई कोई पहली घटना नहीं है। इस साल मुंबई के दो अस्पतालों, नाशिक और भंडारा के अस्पतालों में भी ऐसी ही बड़ी घटनाएं हुईं, जिनमें कुल मिलाकर पचास से ऊपर लोग मारे गए। ये सारी घटनाएं उन अस्पतालों में हुईं, जहां कोविड मरीजों का गंभीर इलाज चल रहा था। हैरानी की बात है कि महाराष्ट्र प्रशासन ने उन घटनाओं से कोई सबक क्यों नहीं लिया। अस्पतालों के गहन चिकित्सा कक्ष दूसरे वार्डों की अपेक्षा अधिक संवेदनशील होते हैं। वहां उन्हीं मरीजों को रखा जाता है, जिनकी स्थिति नाजुक होती है। उनमें विशेष प्रकार के यंत्र लगे होते हैं, ज्यादातर मरीजों को आॅक्सीजन लगा होता है, उनमें से कई बेहोशी की हालत में होते हैं। ऐसे में वहां आग लगने का मतलब है उनकी जान को खतरा। फिर भी अस्पताल प्रशासन कैसे उन जगहों पर बिजली के मामले में लापरवाही भरा रवैया अख्तियार करता है। गहन चिकित्सा कक्ष में आग लगने की घटनाओं को मामूली लापरवाही या चूक मान कर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, इसके जिम्मेदार लोगों के लिए कठोर दंड का प्रावधान होना चाहिए, तभी शायद उन्हें अपनी जवाबदेही का कुछ अहसास हो।


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