दुष्प्रचार की राजनीति

राहुल गांधी ने भाजपा एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निशाना साधने के लिए जिस तरह हिंदू और हिंदुत्व में अंतर बताया, उससे यही लगता है कि वह अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद से प्रेरित हो गए, जिन्होंने हिंदुत्व को आतंकी संगठनों बोको हराम और इस्लामिक स्टेट जैसा बताकर एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। यह समझना कठिन है कि सलमान खुर्शीद कैसे इस नतीजे पर पहुंच गए कि हिंदुत्व सबसे खूंखार आतंकी संगठनों सरीखा है, वैसे ही यह भी कि राहुल गांधी ने हिंदू धर्म और हिंदुत्व में फर्क कैसे देख लिया? चूंकि राहुल गांधी ने एक तरह से वही लाइन ली, जो सलमान खुर्शीद ने अपनी पुस्तक में रेखांकित की, इसलिए यह तय है कि अन्य कांग्रेस नेता भी उनकी बात को दोहराएंगे। सच तो यह है कि उन्होंने ऐसा करना शुरू भी कर दिया है। अच्छा होता कि कांग्रेस को इसके नतीजों की परवाह होती, क्योंकि सलमान खुर्शीद और राहुल गांधी हिंदूू धर्म को बदनाम करने का ही काम कर रहे हैं। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि राहुल गांधी पहले भी यह काम कर चुके हैं। वह जिहादी आतंकी संगठनों से कहीं ज्यादा खतरनाक हिंदू संगठनों को बता चुके हैं। इसी तरह यह भी किसी से छिपा नहीं कि कांग्रेस नेताओं की ओर से किस तरह भगवा आतंकवाद का जुमला उछाला जा चुका है। यह महज एक दुर्योग नहीं लगता कि कांग्रेस के ही एक अन्य नेता राशिद अल्वी ने जय श्रीराम का नारा लगाने वालों को राक्षस करार दिया। यह हैरानी की बात है कि खुद को जनेऊधारी हिंदू एवं शिव भक्त बताने और उपनिषदों का अध्ययन करने का दावा कर रहे राहुल गांधी इस बुनियादी बात से अनजान रहना पसंद कर रहे हैं कि हिंदू धर्म और हिंदुत्व में कोई अंतर नहीं। इसका मतलब है कि वह न तो हिंदू धर्म से परिचित हैं और न ही उसके गुणों एवं उसकी प्रकृति यानी हिंदुत्व से। इससे इंकार नहीं कि कांग्रेस को भाजपा, संघ के साथ अन्य हिंदू संगठन रास नहीं आते, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह हिंदुत्व को बदनाम करने का काम करें और इस बहाने हिंदू धर्म को नीचा दिखाएं। जब हिंदुत्व का समस्त आधार ही हिंदू धर्म है और हिंदू संस्कृति को वही परिभाषित करता है, तब फिर राहुल गांधी या फिर सलमान खुर्शीद यह कैसे कह सकते हैं कि ये दोनों अलग-अलग हैं? हिंदुत्व को हिंसा और नफरत का पर्याय बताना एक तरह से हिंदू धर्म पर प्रहार करना है। हिंसा की घटनाओं को किसी धर्म विशेष से जोड़ना एक शरारत ही है। यह शरारत तब और स्पष्ट हो जाती है, जब इन घटनाओं का उल्लेख करते हुए धर्म विशेष की चर्चा की जाती है।


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