... तो मौतों पर लग सकती है ब्रेक

यह संतोषजनक है कि राजमार्गों पर दुर्घटना के लिहाज से जोखिम बहुल माने-जाने वाले ठिकानों की पहचान कर उन्हें ठीक करने का काम किया जा रहा है। बीते तीन साल में ऐसे 60 प्रतिशत ठिकानों को दुरुस्त कर दिया गया है। ब्लैक स्पाट कहे जाने वाले ऐसे जोखिम बहुल ठिकानों को सर्वोच्च प्राथमिकता देकर ठीक करना कितना आवश्यक है, यह इससे समझा जा सकता है कि जो ऐसे स्थल ठीक कराए गए हैं, उनमें बीते तीन सालों में 28,000 मौतें हुई थीं। साफ है कि शेष ऐसे ठिकानों को शीघ्र ठीक कराकर तमाम मौतों को रोका जा सकता है। यह जरूरी काम किए जाने के साथ यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सड़कों पर न तो नए जोखिम बहुल ठिकाने बनने पाएं और न ही उन कारणों की अनदेखी होने पाए जिनके चलते मार्ग दुर्घटनाओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। भारत उन देशों में शीर्ष पर है, जहां कम वाहन होने के बावजूद अधिक मार्ग दुर्घटनाएं होती हैं। समय के साथ मार्ग दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। कुछ वर्ष पहले तक मार्ग दुर्घटनाओं में जान गंवाने वालों की संख्या करीब एक लाख सालाना हुआ करती थी, लेकिन यह आंकड़ा एक लाख को पार कर रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि जैसे-जैसे नए राजमार्ग बन रहे हैं और पुराने बेहतर होते जा रहे हैं वैसे-वैसे मार्ग दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं? इस प्रश्न पर न केवल गहनता से विचार होना चाहिए, बल्कि मार्ग दुर्घटनाओं को कम करने के लिए हरसंभव उपाय भी किए जाने चाहिए। इन उपायों पर केंद्र और राज्य सरकारों, दोनों को ध्यान देना होगा। निश्चित रूप से अच्छी सड़कें उन्नति का मार्ग हैं, लेकिन यह ठीक नहीं कि उनके निर्माण के साथ ही वे दुर्घटनाओं की गवाह बनती रहें। सड़क दुर्घटनाओं का कारण केवल जोखिम वाले ऐसे ठिकाने नहीं जो या तो गलत डिजाइन की उपज हैं या फिर अतिक्रमण की। इसके अलावा खटारा वाहन, अकुशल चालक और यातायात नियमों की अनदेखी भी सड़क दुर्घटनाओं का कारण बनती है। अपने देश में राजमार्गों पर ट्रक, बस और कार से लेकर ट्रैक्टर, दोपहिया वाहन और बैलगाड़ी तक चलते दिखते हैं। कभी कभी तो उलटी दिशा में भी वाहन चलते नजर आ जाते हैं, क्योंकि तय दिशा और लेन पर चलने का नियम भले हो, लेकिन उसका पालन मुश्किल से होता है। इसका कारण यह भी है कि न तो यातायात पुलिस सजग है और न ही औसत चालक। एक समस्या यह भी है कि सड़कों को अतिक्रमण और बेसहारा पशुओं से बचाने के जो उपाय किए जाते हैं वे स्थायी नहीं रह पाते। आमतौर पर स्थानीय नेताओं के हस्तक्षेप से ऐसे प्रबंध निष्प्रभावी हो जाते हैं। उचित यह होगा कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर सड़क दुर्घटनाओं को रोकने का अभियान चलाएं।


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