किसानों के लंबे संघर्ष की जीत

तीनों कृषि कानून वापस लेने के फैसले पर नेताओं की प्रतिक्रियाएं


मुंबई

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीनों कृषि कानून वापस लेने के फैसले पर महाराष्ट्र में तीव्र प्रतिक्रियाएं देखने को मिली। महाविकास आघाड़ी में शामिल तीनों दल शुरुआत से ही इन्हें काले कृषि कानून बताकर विरोध कर रहे थे। कृषि कानूनों को वापस लेने के फैसले पर सत्ता पक्ष ने इसे किसानों के लंबे संघर्ष की जीत करार दिया है। वहीं भाजपा का कहना है कि इससे किसानों को भारी नुकसान होगा।

आम जनता की ताकत का एहसास: ठाकरे

राज्य के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कहा कि देश को आम जनता की ताकत का एहसास समझ में आया। मुख्यमंत्री ने कहा कि पूरे देश में कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध का माहौल था। आंदोलन किया जा रहा था और ये आंदोलन आज भी चल रहा है। हम सभी का पेट भरने वाले अन्नदाता बेकार में ही शिकार हो गए हैं, लेकिन इन अन्नदाताओं ने अपना पराक्रम दिखाया, उन्हें मेरा सलाम है। इस अवसर पर मैं इस आंदोलन में अपनी जान गंवाने वाले वीरों को भी विनम्रतापूर्वक नमन करता हूं। बहरहाल, अब इस सरकार की नींद खुली है, और आज गुरु नानक जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री द्वारा इन कानूनों को वापस लेने की घोषणा का सबसे पहले मैं स्वागत करता हूं। मुख्यमंत्री ने कहा कि मुझे उम्मीद है कि इन कानूनों को निरस्त करने की तकनीकी प्रक्रिया जल्द ही पूरी कर ली जाएगी।

किसानों के लंबे संघर्ष को सलाम: पवार

राकांपा अध्यक्ष और देश के पूर्व कृषि मंत्री शरद पवार ने अपनी विदर्भ यात्रा के दौरान कहा कि मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद एक ही बार में तीन कृषि कानून बनाए और इन्हें कुछ भी घंटों में मंजूर किया गया। इस दौरान देश के राज्य प्रतिनिधि, सांसदों, किसान संगठनों से चर्चा कर उन्हें विश्वास में लेने की प्रक्रिया नहीं हुई। पवार ने कहा कि एक बात ठीक हुई कि इस संघर्ष में उत्तर प्रदेश के कुछ इलाके, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा के किसान अधिक ताकत से उतरे। अब पंजाब और उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं। 

चुनाव में भाजपा कार्यकर्ताओं के आने पर जनता उनका विरोध करेगी, इसकी कीमत उन्हें चुकानी होगी, इसे ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार ने ये कानून रद्द किए हैं। इस मांग को लेकर साल भर  संघर्ष करने वाले किसानों को मैं सलाम करता हूं।

किसानों को होगा भारी नुकसान: पाटिल

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल ने कहा कि तीन कृषि कानूनों को वापस लेने के फैसले से किसानों को भारी नुकसान होगा। पत्रकारों से बातचीत करते हुए पाटिल ने कहा कि  एक छोटा समूह कानूनों के महत्व को समझने में विफल रहा। एक खास समूह इस मुद्दे पर पूरे देश में अशांति पैदा कर रहा था। 

अंतत: इस कानून को निरस्त करने का निर्णय लिया गया, लेकिन इससे किसानों को भारी नुकसान हुआ। इन कृषि कानूनों को एक बार फिर से यह समझाकर लागू किया जाना चाहिए कि वे किसानों के हित में कैसे हैं?

सत्याग्रह के मार्ग की विजय: अजित पवार

राज्य के उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने कहा कि कृषि कानून वापस लेने का फैसला किसानों की एकजुटता, सत्याग्रह के मार्ग की विजय है। देश के प्रधानमंत्री का आभार। किसानों ने शांतिपूर्वक लंबी लड़ाई लड़ी, ऐसे में उनका अभिनंदन। कृषि उत्पादों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देने के कानून को केंद्र सरकार की तरफ से जल्द ही मंजूर किया जाना चाहिए।  लोकतंत्र में लोगों की इच्छाओं की जीत होती है, यह बात फिर से साबित हो गई।

किसानों ने सरकार को झुकाया: पटोले

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नाना पटोले ने कहा कि किसानों सामने मोदी सरकार को झुकना पड़ा है। उत्तर प्रदेश समेत आगामी विधानसभा में हार के डर से कृषि कानून को वापस लेने का फैसला लिया गया है। यह किसानों की एकजुटता की  ऐतिहासिक विजय है। पटोले ने कहा कि किसानों के इस आंदोलन के पहले दिन से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व राहुल गांधी के नेतृत्व में हमारी पार्टी उनके साथ खड़ी थीl

जिम्मेदारी से भाजपा बच नहीं सकती: थोरात

राज्य के राजस्व मंत्री बाला साहेब थोरात ने कहा कि हुकुमशाही सरकार को किसानों के आगे झुकना पड़ा। किसान आंदोलन के दौरान किसानों पर जो अत्याचार हुए हैं, उसकी जवाबदारी से भाजपा सरकार बच नहीं सकती। 

मोदी सरकार हम दो हमारे दो की सरकार है। तीन कृषि कानून लेकर किसानों को खत्म करने का काम हो रहा था। यह किसान एकता की विजय है।    

पहली बार मन की बात: राउत

शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा कि पिछले डेढ़ साल से काले कृषि कानून के विरोध में किसान आंदोलन कर रहे थे। शुरुआत से ही सरकार इस मामले पर कुछ सुनने को तैयार नहीं थी। किसान आंदोलन को सरकार ने पूरी तरह नजरअंदाज कर रखा था, इस दौरान कई किसानों की मौत हो गई। किसानों को खालिस्तानी, पाकिस्तानी, आतंकवादी जैसी उपाधि दी गई। लेकिन किसानों की तरफ से ली गई भूमिका पर देश की जनता की भावना उनके साथ थी। आखिरकार प्रधानमंत्री को ये काले कानून वापस लेने पड़े। भले ही इसमें देर हो गई है, लेकिन प्रधानमंत्री ने देश की आवाज सुनी और पहली बार मन की बात देश की भावना से जुड़ गई। इसका मैं अभिनंदन करता हूं।


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