बुजुर्गों के प्रति अपराध में आई कमी

पटना

यह कानून के शासन का असर है या समाज की संवेदना, बुजुर्गों के लिए सुकून की बात है कि उनके खिलाफ अपराध में कमी आई है। नेशनल क्राइम रिकाॅर्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट का आंकड़ा बता रहा है कि बीते तीन वर्षों में उतार-चढ़ाव के साथ बुजुर्गों के प्रति अपराध कम हुए हैं। अगर दूसरे बड़े राज्यों से तुलना करें, तब भी इस मोर्चे पर अच्छी कामयाबी नजर आती है। राज्य में 2020 में अपराध की इस श्रेणी में 322 मामले दर्ज हुए। यह 2018 के 424 से कम और 2019 (251)से अधिक है। यह कम हैरत की बात नहीं है कि पिछले साल बुजुर्गों के साथ धोखाधड़ी का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ। जबकि गुजरात में 196, कर्नाटक में 106 और महाराष्ट्र में 719 मामले दर्ज किए गए। दिलचस्प यह है कि पुलिस सुस्ती के मामले में भेदभाव नहीं करती है। बुजुर्गों की ओर से दायर किए जाने मामलों की जांच की रफ्तार आम मुकदमों की तरह ही है। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में पिछले साल तक 452 मामले जांच के लिए लंबित थे। इनमें से 130 मामले वर्षों पुराने हैं। पिछले साल पुलिस ने 251 नए-पुराने मामलों में चार्जशीट दाखिल किया। अगर कुल मामलों की चर्चा करें, तो रिपोर्ट बनाने तक 1713 मामलों में ट्रायल चल रहा था। पिछले साल बुजुर्गों से जुड़े किसी मामले में किसी को सजा नहीं मिली। सबसे अधिक 11,565 मामले महाराष्ट्र में लंबित हैं। बड़े राज्यों में उत्तर प्रदेश की स्थिति अच्छी कही जा सकती है। यूपी में लंबित मामलों की संख्या सिर्फ 394 है।

अनुसूचित जाति के मामलों में खास कमी नहीं

रिपोर्ट में बताया गया है कि राज्य में अनुसूचित जाति के खिलाफ अपराध के मामलों में खास कमी नहीं आई है। 2018 में इनकी संख्या 7,061 थी। 2019 में 6,544 हुई। 2020 में 7,368 मामले दर्ज किए गए। देश में सबसे अधिक 12,714 मामले उत्तर प्रदेश में दर्ज हुए हैं। राज्यों की तुलना करें तो अधिक मामलों के लिहाज से यूपी के बाद बिहार का नंबर है। लेकिन दोनों की संख्या में भारी अंतर है। अनुसूचित जातियों की हत्या के मामले में भी दोनों राज्य पहले-दूसरे नंबर पर हैं। पिछले साल बिहार में 110 और उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति के 221 लोगों की हत्या हुई।


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