किसान और राजनीति

किसान और कृषि हमारी अर्थव्यवस्था की धुरी रही हैं और समाज का निर्णायक स्तम्भ है, मतदाताओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसकी अनदेखी कोई भी दल छोटा हो या बड़ा कदापि नहीं कर सकता। फिलहाल उत्तर प्रदेश, पंजाब सहित पांच राज्यों के चुनावों की दुुंदुभी बज रही है तो स्वाभाविक है कि पिछले लम्बे समय से केंद्र द्वारा लाये गए कृषि कानूनों और अन्य मुद्दों को लेकर आन्दोलनरत किसान अब राजनीति के केंद्र में हैं। प्रधानमंत्री ने सदाशयता दिखाते हुए इन तीनों कानूनों को रद्द करने की घोषणा की और माफी मांगने तक की नम्रता दिखाई. उसके बाद तो सही यही होता कि किसान आन्दोलन का रास्ता त्याग देते और अन्य मुद्दों पर बातचीत के माध्यम से उनका समाधान करते. परन्तु यदि ऐसा हो जाता तो यह अजूबा से कम नहीं होता, कारण हमारी राजनीति का रंग ही ऐसा है कि वह किसी मुद्दे को आसानी से सुलझने देने की बजाय उसे तब तक गारना चाहती है, जब तक उसमें किसी भी तरह की राजनीतिक लाभ लेने की गुंजाइश रहती है. अब इस मामले में भी राजनीति हो रही है. केंद्र सरकार ने बड़ा दिल दखाते हुए तीनों कृषि कानून वापसी की प्रक्रिया शुरू कर दी है, तो अब विपक्ष इस बार अपनी गोटियां बिठाने और मीन-मेख निकालने, लुभावने वादे करने पर तुला है, इसमें कुछ प्रोफेशनल आंदोलनकारी भी सक्रिय हो गए हैं और कुल मिलाकर राजनीतिक फायदा उठाने के लिए हर कोई किसानों को उसका सबसे बड़ा हितैषी बताने पर लगा है. दुर्भाग्य से किसान भी उनके सुर में सुर मिला रहे हैं और केंद्र सरकार की उदारता को उसकी कमजोरी मान अब अधिकतम लाभ या रियायत प्राप्त करने की जुगत में हैं. किसानों को वाजिब हक, अधिकार और उनके उत्पादों का उचित दाम मिलना चाहिए, उनकी माली हालत में स्थायी और उचित सुधार होना चाहिए, सरकार ने उसी लिए कानून बनाये थे. वह किसानों के एक वर्ग को मंजूर नहीं हुआ, वह आन्दोलन करने लगा अब जब सरकार ने बात मान ली है और अन्य मुद्दों के लिए मिल बैठकर बातचीत की रजामंदी दर्शायी है, तो उन्हें भी बड़ा दिल दिखाते हुए उसी तरह की सकारात्मक प्रतिि‍क्रया देनी चाहिए. दुर्भाग्य से वैसा नहीं हो रहा है. किसान नेता रोज नई-नई बात सामने रख रहे हैं और पूरा विपक्षी कुनबा भी अपनी ओर से लंबे-चौड़े वादे कर केंद्र की नियत पर संदेह व्यक्त कर, उसमें मीन-मेख निकाल कर अपनी गोटी बिठाने के चक्‍कर में है. किसानों के यह समझना होगा. विपक्ष हािशये पर है उसके पास खोने को कुछ नहीं है. वह लम्बे-चौड़े वादे कर सकता है कारण ऐसा कर उसे कुछ मिले या ना मिले पर सतारूढ़ दल की परेशानी बढ़ाने का आनंद जरूर ले सकता है. अब यह किसान नेताओं को तय करना है कि उनके हित में क्या है? उन्हें कुत्सित राजनीति का हथियार बनना है या अपना भला करना है. अपना भला करने के लिए उन्हें स्वविवेक से  विचार कर निर्णय करना होगा. राजनीति तो उनके मुद्दों को लेकर बड़े-बड़े नेताओं ने की, लेकिन उनका भला किसके नेतृत्व में हुआ, यह उन्हें सोचना होगा और अपना निर्णय लेना होगा. किस बात को कितना कहना है यह भी बात उठाने वाले को पता होनी चाहिये, नहीं तो बनी बात बिगड़ जाती है, यह हर आन्दोलनकारी को पता होना चाहिए. किसानों के लिए भी यही बात लागू होती है.  किसानों को उनका वाजिब हक मिले यह पूरा देश चाहता है वह राजनीतिक हथियार बनकर नहीं मिलेगा, केंद्र के उदारता को उसकी कमजोरी मान कर या विपक्ष से हाथ मिलाकर बिल्कुल नहीं.


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